Sunday, April 21, 2013

कान्‍हा से अमरकंटक


कान्‍हा से अमरकंटक
कान्‍हा छोड़ते समय लगा कि हम भीतर से कुदरत के कितने करीब होते हैं. मेकानिकल लाइफ की आपा-धापी में हम गैर-कुदरती जीवन शैली में बंध जाते हैं. जब भी इसके करीब आने का मौका मिले, हमें दिली सुकून मिलता है. इन्‍हीं सुकूनी लम्‍हों के नज़ारे भरे कान्‍हा से तीर्थराज अमरकंटक की ओर चल पड़े. यह कान्‍हा से 165 किलोमीटर दूर 3500 फीट की ऊँचाई पर स्‍थित है. यहीं से नर्मदा और सोन नदियों का उद्गम होता है. इनके अलावा यहॉं कबीर चबुतरा, कपिल मुनि का आश्रम और कपिल धारा, नर्मदा माई की बगिया, नर्मदा और सोन के अलग-अलग कुण्‍ड, कलचुरी राजाओं द्वारा बनाये गये पॉंचवीं शताब्‍दि के संरक्षित मंदिर, तांत्रिक मंदिर, दुर्गाधारा, ज्‍वालेश्‍वर में बन रहा सबसे ऊँचा शिव लिंग मंदिर, सर्वोदय जैन मंदिर आदि कई प्रमुख स्‍थल हैं.

कान्‍हा से अमरकंटक जाने फिर से मांडला जिला पार करना पड़ता है. अंदाजन 100 किलोमीटर तक हमारे साथ जंगल ही चलता रहा. बीच-बीच में चंद क्षणों के लिए मैदानी इलाका आया. पर अधिकतर वन्‍य क्षेत्र ही साथ चलता रहा. दोपहर में भोजन के बाद सवा-एक बजे निकले और पॉंच बजे तक कपिलधारा पहुँच गये. रास्‍ते में कई जगह छोटे-छोटे तालाब पानी से लबालब भरे दिखे.  ये रास्‍ते में पड़ने वाले गॉंव के तालाब होंगे. हैदराबाद में पानी की मारा-मारी देख ये नजारे सुकून भरे लगते हैं कि पानी भरा पड़ा है और कोई ले नहीं रहा. इसके साथ एक और खास बात नज़र आयी ‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना’ की. लगभग हर गॉंव के बाहर एक शिलान्‍यासी पत्‍थर लगा दिखा. ऐसा मैने पहली बार देखा. इस योजना के तहत बीसियो सड़कें बिछी पायी जिन्‍हें देख हमें लगा यहॉं केन्‍द्र सरकार से मिलने वाले फण्‍ड का यहॉं सही इस्‍तेमाल हो रहा है. अमरकंटक से पहले कबीर चबूतरा पड़ता है. जनश्रुतियों के मुताबिक यहॉं कभी संत कबीर ने साधना की होगी. यह स्‍थान आने से कुछ किलोमीटर पहले सड़क पर लगे घने पेड़ दोनों ओर से झुककर आपस में मिल गए हैं जिससे गाड़ी में जाते हुए लगता है कि हम झाड़ों की गुफा से गुजर रहे हैं. इन झाड़ों के पत्‍ते एकदम नये थे तो यह नजारा और भी अद्भुत था. 

 





कपिलधारा नर्मदाकुण्‍ड से निकले पानी को छोटे बांध के रूप में रोककर बहायी जा रही है. पहले यह नर्मदा कुण्‍ड से निकल सीधी बहा करती थी होगी जिसे अब बॉंध के रूप में रोक छोड़ा जा रहा है. यहॉं धारा 100 फीट की ऊँचाई से गिरती और नदी खाई और जंगल से होती हुई मैदान में प्रवेश करती है. यहॉं नीचे जाने सीढियां बनी है और इस धारा में सम्‍हलकर जाएं तो स्‍नान भी किया जा सकता है. नीचे जाने से पहले गाड़ी रोकी और जलजीरे का पानी पीने के बहाने भीगे चने और मुरमुरों की चाट खायी जो बड़ी स्‍वादिष्‍ट थी. पानी नदी का नहीं कुंए का मिला जो बहुत मीठा था. इसके बाद हम सभी नीचे गये और खाई में उतरकर जलप्रपात का आनंद लिया. वापसी में लगभग दो-तीन सौ सीढ़ियां चढ़ते हम सबका दम फूलने लगा था. बिजली नहीं होने के कारण जो चन्‍द दुकानें खुली थीं वह सब बन्‍द हो चुकी थीं. कच्‍चे मकानों में अंधेरे के कारण चिराग चल चुके थे और लकड़ियों पर खाना बनाने की तैयारी की जा रही थी. इतने में हम सब भी ऊपर आ चुके थे. 



यहॉं से अमरकंटक हॉलीडे होम के लिए रवाना हुए और संकरी गलियों से गुजरते हुए लगा कि यह कैसी जगह बना है. पहुँचकर देखा तो बड़ा ही शानदार हॉलीडे होम है. कान्‍हा की तरह यहॉं भी
आगमन पर थोड़ी पूछताछ के बाद कमरे मिल गये. छोनू और गुणाजी ने दौड़कर कमरों में सामान रखवाया और पुष्‍टि कर दी कि सब बढ़िया है याने शौचालय मिलाकर. कमरों में जाने तक नर्मदाजी की आरती का समय हो आया था. यहॉं टीवी-वीवी सब लगा था तो हमारे साढ़ू और गुणाजी आइ पी एल देखने बैठ गये. हम चार ताजा होकर आरती के लिए गये. किलोमीटर से भी कम दूरी पर मंदिर था. पहुँचते ही मंदिर बाहर से आकर्षित करने लगा. दूर से किसी सफेद गुंबदवाले गुरूद्वारे का अहसास हो रहा था. भीतर गये तो कुण्‍ड में ऊँचे स्‍वर और मंत्र पाठ से आरती खत्‍म हो रही थी. तुरंत लगा कल फिर आना चाहिए.

कहावत अनुसार नर्मदा जी पार्वती पुत्री हैं इसलिए इन्‍हें दुर्गा रूप भी माना जाता है. लेकिन इस जगह का नाम अमरकंटक कैसे पड़ा, अब भी मन में था और इसका सही उत्‍तर नहीं मिल पा रहा था. कुण्‍ड के बगल में जब शिव जी का मंदिर देखा तो लिखा था ‘बाबा अमरकण्‍ठक’. कुछ समझ में आया. याने शिव जी ने यहॉं अपने कण्‍ठ में रखे विष का शमन किया था तब ऋषिकेष से 22 किलोमीटर ऊपर ‘नीलकंठ महादेव’ की याद आयी. यह स्‍थान भी इसी महत्‍व का है. लगा कि कहीं कुछ जुड़ नहीं रहा है. खैर, दिल-दिमाग की रस्‍साकशी में ‘तीरथ-परशाद’ लेकर कुण्‍ड के सामने देखा कि एक दो-ढ़ाई फिट ऊँचा, काले पत्‍थर का हाथी बना है. इसे इस तरह बनाया गया है कि इसके पैरों के बीच से हर मोटा-दुबला आदमी गुजर सकता है. कुछ लोग कोशिश कर रहे थे. मैं भी जोर-आजमाइश करने फर्श पर लेट इसके पैरों के बीच से गुजरने की कोशिश करने लगा. लोग चिल्‍ला रहे थे. भाई साहब निकल गये, निकल गये (सुनकर लगा किसके भाई साहब निकल गये. हैदराबाद में निकल जाने का मतलब होता है पगला जाना या अजीबो-गरीब हरकतें करना. किसी अजीब हरकत पर यहॉं कहा जाता है, क्‍या रे निकल गया क्‍या?) ताकत लगाते-लगाते मन ही मन में ये सुन गुदगुदी हुई तो थोड़ी कोशिश के बाद खुद को वापस खींच लिया. एक आदमी ने कहा ‘थोड़ी कोशिश करते तो आप निकल जाते’. दिल में आया कि इन्‍हें कैसे कहूँ कि मैं यहॉं निकलने नहीं आया हॅूं. इस बीच 8.30 बज चले थे. सोचा यहॉं किसी से पूछा जाए. मंदिर में बैठे पुजारी से पूछा तो उन्‍होंने भी नामकरण के संबंध में ऐसी ही जानकारी दी. 

यहां सोन ओर नर्मदा की प्रेमकथा पूरे अंचल में प्रचलित है। कहा जाता है कि राजा मेकल (अब मेकल पर्वत) ने पुत्री राजकुमारी नर्मदा के लिए निश्चय किया कि जो राजकुमार बकावली के फूल लाकर देगा, उसका विवाह नर्मदा से होगा। राजपुत्र शोणभद्र, बकावली के फूल ले आया लेकिन देर हो जाने से विवाह नहीं हो पाया. इधर नर्मदा, सोन के रूप-गुण की प्रशंसा सुन आकर्षित हुई और नाइन-दासी जोहिला से संदेश भेजा. जोहिला ने नर्मदा के वस्त्राभूषण मांग लिए और संदेश लेकर सोन से मिलने चली. जयसिंहनगर के ग्राम बरहा के निकट जोहिला का सोन से संगम, वाम-पार्श्व में दशरथ घाट पर होता है और कथा में रूठी राजकुमारी नर्मदा कुंवारी ही उल्टी दिशा में बह चलती है याने अब पश्‍चिम दिशा में बहते हुए अरब सागर में जा मिलती है। जबकि सोन पूर्व की तरफ बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है. हमारे पास ब्रह्मपुत्र और सोन दो नद हैं और बाकी सब नदियां.

यहां नर्मदा और  सोन के साथ-साथ जोहिला नदी का भी उदगम स्थान है। दूसरा समुद्र तल से 1065 मीटर की ऊँचाई पर यहॉं सतपुड़ा और विंध्‍य की पहाड़ियां भी आपस में मिलती हैं. अत: तीर्थराज अमरकंटक में कान्‍हा की तरह यहां साल के पेड़ होने के साथ सागवान और महुआ के पेड़ भी अधिक संख्‍या में है. साल और सागवान की खासियत से तो हम परिचित हैं पर महुए के संबंध में ऐसा भी बताया गया कि महुए की छाल / रस का प्रयोग कच्‍ची शराब बनाने में किया जाता है. इनके अलावा यहां कई आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां भी पायी जाती हैं. पूरे अमरकंटक क्षेत्र में घूमते हुए ये तीनों अलग-अलग दिखायी पड़ रहे थे. पतझड़ के कारण सागवान के पत्‍ते झड़ चुके थे जबकि साल एकदम हराभरा था और महुआ इतना ऊँचा नहीं होता अत: ये भी अलग दिखाई दे रहा था.

इन सबके बीच दूसरे दिन का कार्यक्रम बना. होटल में कुशवाहा जी से जानकारी मिल गई और ड्राइवर को भी समझा दिया कि कहॉं-कहॉं जाना है. दूसरे दिन सुबह नाश्‍ता कर ताजा दम गाड़ी में बैठ पहले सोणभद्र का उद्गम (सोनमुढ़ा) देखने गये. वास्‍तव में सोणभद्र के उद्गम स्‍थान से सूर्योदय बहुत खूबसरत दिखायी देता है जो हम देख नहीं पाये. इस पहाड़ी से एक बारीक धारा के रूप में सोणकुण्‍ड से झरने के रूप में बह सोण का उद्गम होता है और इसके बाद पहाड़ और जंगल से होते हुए यह बह निकलती है. 

यहां की एक और खास बात है, यहां के लंगूर. हम जैसे ही गाड़ी रोकते हैं, चने-बटाने बंदर और लंगूरों को खिलाने, इन्‍हें बेचने के लिए कुछ औरतें आ जाती हैं और इनके साथ लंगूर सेना भी. पर ये आक्रमण नहीं करते. पांच-दस रूपये देकर इन्‍हें चने-बटाने डालें तो ये मस्‍त बैठ खाते हैं. और आपके हाथ में हो तो हाथ से लेकर खाते हैं. लगे हाथ ये भी आनंद  उठा लिए.          

इससे पहले रास्‍ते में बन रहा सर्वोदय जैन मंदिर और श्रीयंत्र स्‍वरूप तांत्रिक मंदिर देखा. यह जैन मंदिर गुजरात के अक्षरधाम मंदिर की तर्ज पर बनाया जा रहा है. यहां अष्‍टधातू की बनी सबसे ऊँची मूर्ति पार्श्‍वनाथ की स्‍थापित की जा रही है. मंदिर में कला और नक्‍काशी देखते ही बनती है.
  

श्रीयंत्र  मंदिर की विशेषता है कि यह देवी का शक्‍तिपीठ माना जाता है और यहॉं मान्‍यता के अनुसार देवी के बाजू, कलाई का हिस्‍सा गिरा था. मंदिर पिछले 27 सालों से निर्माणाधीन है. बनावट से लगता है कि किसी जादू-टोने की जगह प्रवेश कर रहे हैं. इसे केवल विशेष मुहूर्त पर बनाया जाता है. याने विशेष मुहूर्त जितनी देर के लिये होगा, केवल उतनी ही देर काम चलेगा और
फिर रोक दिया जायेगा. बाहर लिखा था कि भीतर कहीं भी फोटो न लें. बाहर की तो मैंने ले ली. मुख्‍य मंदिर का गर्भ बंद मिला और इसके बाहर रखी त्रिपुर सुंदरी की मूर्ति के समक्ष दो युवा और सौम्‍य साधु अध्‍ययनरत मिले. इन्‍हीं की बातचीत से जानकारी मिली. लगभग 15 मिनट तक उन्‍होंने मंदिर और इस जगह का माहात्‍म्‍य बताते हुए इसे मनुष्‍य जीवन से जोड़ा. बताया कि अभी तो हम गर्भगृह की सीढ़ियां चढ़ पा रहे हैं. जब यह बन जाएगा तो केवल विशेषज्ञ (पंडित, साधु, महात्‍मा आदि) ही आ पाएंगे. कठिन साधना के बाद तंत्रशक्‍ति सिद्धी आंख पर काली पट्टी बांध करवायी जाएगी. जो माता की शक्‍ति यहां ढंके रूप में मौजूद है उससे सिद्धी होगी. अनिष्‍ट होने की दृष्‍टि से इसे कोई देख नहीं सकता. अत: इसे ढंककर रखना शास्‍त्रों के अनुसार अनिवार्य है. ऐसा लगा गर्भ में भी शायद अंधकार ही होगा. इन सभी बातों के बीच मैं कोशिश कर रहा था कि इसमें कोई वैज्ञानिक तथ्‍य बाहर आए, सो आया. श्रीयंत्र की शक्‍ल में बन रहा मंदिर का प्रागंण बरबस ही आकर्षित करता है. प्रभावी स्‍थान लगा तो हम युवा साधुओं से बात करते रहे. इन्‍होंने बताया कि ज्‍योतिष के अनुसार हमारी काल गणना और पंचांग रचना चन्‍द्रगति आधारित है जिसे सूर्यगति आधारित होना चाहिए. इसका अध्‍ययन कर बदलने का प्रयास किया जा रहा है. इस परिवर्तन के बाद सब कुछ बदल जाएगा. शायद इसी बड़े काम की सिद्धी यहां की जाएगी. इन्‍हें अधिक न उलझाये रखते हुए हम बाहर आ गये. पर, सूचनात्‍मक रूप में शिलाओं पर चॉकपीस से लिखी मंदिर की जानकारी की तसवीरें ले लीं.




  

सोणभद्र उद्गम और तांत्रिक मंदिर देख हम माई की बगिया देखने गये. कहा जाता है कि नर्मदा मैय्या का बचपन यहीं बीता था. वैसे यहां काई चमन नहीं. एक कुण्‍ड और घने पेड़ ही हैं. जो खास है वह है गुल बकावली का पेड़. जिस फूल की चर्चा ऊपर की गई है वह यहीं पर मिलता है.  

यहां भी कुछ समय गुजार हम दुर्गाधारा देखने चल दिये. ड्राइवर ने कहा कि साहब वहां कुछ नहीं है. मैं भी कभी नहीं गया हूँ. साफ था उसकी आने में अनिच्‍छा थी. उसने एक और ड्राइवर से पुष्‍टि भी करा दी. लेकिन उसने एक बात कही कि साहब यहां तक आए हो, कुछ ही दूरी पर है, देखते चले जाना. हमने कहा हम जरूर जाएंगे. इस पर खीज से ड्राइवर चल पड़ा. 


दुर्गाधारा पहुँच देखे कि यह मंदिर के पास सड़क के नीचे से कचरे में से बहती हुई एक पतली बेजान धारा है. मंदिर की बनावट किसी रास्‍ते में बने सामान्‍य मंदिर की तरह. मुझे छोड़ बाकी सब भी गाड़ी से उतरने तैयार नहीं दिखे. लेकिन मैंने अपने बाकी दो को दबाकर बुला लिया. सड़क की बांई ओर मंदिर की सीढ़ियां चढ़ ऊपर गये तो देखते हैं कि एक खूबसूरत जलधारा कुछ ऊँचाई से गिर रही है. एकदम साफ और धूप में चमकती जलधारा. फिर क्‍या हम तीनों थम गये. मैं तो देखते ही पानी की धारा में कपड़े ऊपर कर चला गया. बेगम साहिबा नाराज हो रही थी. लेकिन मैं रुका नहीं. इतने में देखा कि पीछे से साढ़ू, साली और गुणाजी भी आ गये. हेमन्‍त जी भी देख खुश हुए. मनुहार कर गुणा जी को भी पानी में खींच लिया. खूब फोटो लिए. फिर बेटी प्‍यार और गुस्‍से से शामिल हो गयी. गुणा जी यहीं नहीं रुका. अपने पिताजी को लेकर बगल की सीढ़ियों से ऊपर चला गया. कुछ देर बात हम भी ऊपर चढ़े. ऊपर और खूबसूरत नजारा. दो-तीन फीट की ऊँचाई से गिरता प्रपात. पानी का कुण्‍डनुमा जमा होकर बहना. एकदम साफ पानी. फिर क्‍या था. अब एक-एक कर सब पानी में आ गये. 
यहां शायद शाम तक भी बैठें तो कोई नहीं आयेगा. एकदम एकान्‍त में बहता पानी, जलधारा और प्रपात. मैंने तो पानी भी पिया. एकदम खरा और सच्‍चा मिनरल वाटर. लगभग घण्‍टा भर यहां व्‍यतीत कर ज्‍वालेश्‍वर महादेव देखने निकल पड़े. मंदिर के एकदम बगल से निशान लगा था. तीन किलोमीटर ऊपर. रास्‍ता संकरा, एकदम ऊबड़-खाबड़ और पथरिला. एकदम सूनसान. पिछले चार-पांच किलोमीटर से ही आदमी दिखने बन्‍द हो गये थे. एकाध ट्रक और कार मुश्‍किल से गुजरे होंगे. घुमावदार रास्‍ते से शंकित मन लेकर जा रहे थे. क्‍या हम सही जा रहे हैं. लगभग देढ़ कलोमीटर के बाद दूर से कुछ लोग और गाड़ी दिखायी दिये तो लगा कि सेफ हैं. यहां से और ऊपर फिर ऐसे ही होकर हम ज्‍वालेश्‍वर महादेव पहुँचे. यहां कहावत अनुसार देश का सबसे ऊँचा शिवलिंग बनाया गया है. मंदिर निर्माण जारी है. बैठे पंडित अगिनहोत्री जी का रूद्रपाठ और उच्‍चारण सुन वहीं रुक गये. कई दिनों बाद इतना साफ स्‍वर और उच्‍चारण संस्‍कृत पाठ का सुनने मिला. जिज्ञासावश पूछा तो नाम अग्‍निहोत्री बताते हुए हम उम्र पंडित जी ने कहा कि वे संस्‍कृत के अध्‍यापक थे. अब भी पढ़ाते हैं. और पौरोहित्‍य संभवत: पारिवारिक काम है. खैर मंदिर देख और अग्‍निहोत्री जी से मिलकर सुकून मिला. लेकिन गाड़ी में बैठे बाकी तीन लोग अधीर हो रहे थे कि खाने का वक्‍त हो गया है. और थकान से आराम भी चाहिए. लेकिन, असल में जिस काम के लिए आए थे वह एकदम भागते-भागते करना पड़ा. दुर्गाधारा में पहुँचने वाली धारा का उद्गम. संभवत: इसी मंदिर से चंद कदमों की दूरी पर जोहिला नदि का उद्गम होगा जो एक जगह कुंए से निकलकर नीचे की ओर बहती है. बस यहां से हम होटल लौट आए.

खाना खाकर आराम किए तो शाम हो चली थी. सात बजे आरती का समय था. इससे पहले कलचूरी राजाओं द्वारा बनाये गये पॉंचवीं सदी के मंदिर देखने थे जो नर्मदाकुण्‍ड के एकदम बगल वाले परिसर में है. ये संरक्षित मंदिर भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग के अधीन है. अत: ये सूर्योदय से सूर्यास्‍त तक ही खुले रहते हैं. हमारे जाने से चंद क्षण पहले ही इसका गेट बंद हुआ और हम देख नहीं पाये. यहां से नदी के घाट पर स्‍नान करने जाना था. पर अंधेरा देख घाट पर जाने की हिम्‍मत नहीं हुई. घाट की दूसरी ओर याने सड़क की बांयी ओर नहर नुमा स्‍नानकुण्‍ड में ही एकदम ठण्‍डे पानी में चार-पॉंच डुबकियां लगायीं और स्‍नान हो गया. मेरे अलावा कोई स्‍नान नहीं किया. मन तो कर रहा था तैरकर दूसरी ओर जाऊँ पर अंधेरा होता देख तथा गहराई का अंदाजा नहीं होने पर यह रिस्‍क नहीं लिया. पर तैरने की कसक रह गयी. थोड़ा पहले चला जाता तो तैर भी लेता.


खैर तैयार होकर इसी के बगल में नर्मदाकुण्‍ड के मंदिर परिसर में गये आरती देखने जो पहले दिन अधूरी रह गई थी. हेमन्‍त जी और गुणाजी तो नहीं आए आई पी एल देखने के चक्‍कर में तो हम चारों चले गये. समय से पहले पहुँच आरती की तैयारी और आरती देखी. मॉं नर्मदे की एकदम विशिष्‍ट आरती. स्‍थानीय लोग बड़ी श्रद्धा से इसमें शामिल होते हैं. पहले खड़ी बोली में लिखी आरती गायी गई और बाद में संस्‍कृत में लिखी. सभी एकदम साफ स्‍वर में गा रहे थे. लगभग आधा घण्‍टा आरती चली. पंडित जी पूरे ध्‍यान और लय से आरती गा रहे थे. साथ में दीपमाला जल रही थी. एकदम पवित्र वातावरण. यह गंगा जी की आरती से एकदम अलग. वहां जैसी यहां साज-सजावट और बाहरी भव्‍यता नहीं. एकदम सीधी-सादी आरती. आरती बता रही थी कि हम आज भी प्रकृति में ईश्‍वर को देखते हैं. प्रकृति के जरिये ईश्‍वर कितना करीब लगता है. बल्‍कि कुदरत ही ईश्‍वर लगती है. प्रकृति हमारे जीवन की संचारिणी है और इसका संरक्षण हमारी पहली और मूल जिम्‍मेदारी. याने प्रकृति का दोहन वैसा ही और उतना ही किया जाना चाहिए जितना कि जीवन संचालन के लिए आवश्‍यक. यह सब हमें ऐसे ही स्‍थानों पर देखने-समझने मिलता है. यहां के लोग और बच्‍चों में अब भी वही सादगी, मासूमियत. चेहरों पर कोई शिकारीपन और शहरी उज्‍जड़ता के भाव नहीं. ऐसा लगा जैसे इन्‍हें अब भी हमारी तरह ऐशो-आराम की चीज़ें नहीं चाहिए. बस ये जहां-जैसे हैं, एकदम सुखी और प्रसन्‍न. शहरों में तो अंग्रेजीपोश समाज और सीमेंट के जंगल में इंसानियत और कुदरत कबकी खो चुकी है. ईश्‍वर करे प्रकृति जीतनी बची है, वह बची रहे. एक और बात मंदिर के प्रांगण में लिखी थी कि कुण्‍ड और इसके आस-पास बने मंदिरों की पिरक्रमा न करें. इसका कारण नहीं जान पाया. वापस लौटने से पहले नर्मदाकुण्‍ड याने जलस्रोत पर बने शिवजी के एकदम छोटे मंदिर में दर्शन किए. इसीके नीचे से जलधारा बहती है और कुण्‍ड में दिखायी देती है. प्रांगण में कोई यज्ञ भी चल रहा था और कुछ पुरोहित, पंडित यहां की कथा की रिकार्डिंग भी कर रहे थे. इन सबके बाद हम वापस आ गए. दिल में एकदम शांति का एक अलग भाव था. लगा सब छोड़ ऐसी किसी जगह बस जाना चाहिए. हम पूरे जीवन जिसके लिए भागते हैं. वह सब यहॉं मौजूद है. सच, सादगी, ईश्‍वर का ऐश्‍वर्य, उसके करीब और पासंग होने का एहसास.

इसी भावना से लौट खाए और दूसरे दिन सुबह मिश्र जी (खानसामा) द्वारा बनाए पोहे और ब्रेड-बटर का नाश्‍ता लिए निकल पड़े जबलपुर के लिए. अमरकंटक आते समय सरकारी काष्‍ठागार (लकड़ी का गोदाम) देख बहुत दुख हुआ था कि साल और सागवान के हजारों पेड़ेां की लकड़ी यहॉं कटी पड़ी है. इतनी बड़ी मात्रा में लकड़ी देख लगा कि पता नहीं ये जंगल कब तक बचेंगे. ये बेचैनी अमरकंटक छोड़ने से पहले वाली रात वहॉं के सहायक प्रबंधक ने बतायी कि सरकार केवल वही पेड़ों को काटती है जिनकी एक उम्र हो जाती है और जिसे कोई कीड़ आदि लग जाने की संभावना हो. साथ ही, पेड़ों की कटाई के साथ इन्‍हें लगाती भी है. यह सुन राहत मिली.

इस बीच गाड़ी जबलपुर के लिए चल पड़ी थी. 
क्रमश: 

Saturday, April 13, 2013

मध्‍य प्रदेश - कान्‍हा से सॉंची यात्रा संस्‍मरण


'शुरूआत से कान्‍हा की एक रात'

कुछ समय पहले तक टी वी पर लगभग सभी चैनलों पर मध्‍य प्रदेश पर्यटन की ओर से एक आकर्षक विज्ञापन आया करता था. एक महिला की पुतलियों के भीतर गुफानुमा होकर पूरा विज्ञापन मध्‍यप्रदेश की खास पर्यटन स्‍थानों की गीतनुमा जानकारी रोचकता से देता था. इसमें विशेष भीमबेटका का चित्र ऑंखों की पुतलियां घुमाकर दिखाया जाता था. इसका अंत ‘हिन्‍दुस्‍तान का दिल देखा’ और ‘अतुलनीय भारत-The incredible India’ के साथ होता था. जब भी देखता, यह विज्ञापन अपनी तरफ खींचता था. पर्यटन पर इतना जोर देकर बनाया गया यह विज्ञापन कहता है 'एम पी अजब है, सबसे गजब है'. बस इन्‍हीं बातों से मुत्‍तासीर कई बरस से  कार्यक्रम बना रहा था यात्रा का. इस साल बना और हम 3 से 10 अप्रैल तक एम पी घूमने चले गये. एम पी टूरिज्‍म से ही पैकेज लेकर जबलपुर पहुँचे. वहॉं से कान्‍हा, फिर अमरकण्‍टक, जबलपुर, भीमबेटका, भोजपुर, सॉंची और अंत में भोपाल देखते हुए हैदराबाद वापस हुए.

यात्रा की शुरूआत तीन अप्रैल को सिकंदराबाद-पटना रेल से (पटना तक का टिकट लेकर) जबलपुर के लिए हुई.

जबलपुर मेरी मॉं का जन्‍मस्‍थान है इसलिए भी मन में एक खींच और आकर्षण बना हुआ था. पिछले महीने राजधानी रेल से सफर करने के बाद इस ट्रेन में एसी-टू में जाते हुए रेल की बोगियों और उसके अन्‍दर की साज-सज्‍जा, रखरखाव देख सरकार की समाज की तरह खास ट्रेन से आम ट्रेन के प्रति बेरूखी साफ़ दिखी. गाड़ी एकदम पुरानी जैसे किसी साहब के बंगले के सामने जंग खायी पुरानी टीन से लदा मिट्टी का ऊबड़ ग़रीब का कमरा हो. और, किसी मेहमान आने के वक्‍त पिल पड़ी दीवारों की धूल-कालिक झटक राम जी के साथ लगे अमिताभ के ‘डॉन’ के पुराने पोस्‍टर व मिथुन की फोटो को साफ़ कर स्‍वागत के लिए छोड़ दिया गया हो.

ख़ासकर मैं जब भी ट्रेन में सफ़र करता हूँ, अपनी सीट के साथ-साथ शौचालय भी देखता हॅूं कि साफ़-सुथरा है या नहीं. अक्‍सर ये मैले और पुराने पड़े होते हैं जिनमें एक अजीब बू आती है. ये कुछ ही देर की यात्रा में इतने गंदे कर दिये जाते हैं कि सुबह इन्‍हें इस्‍तेमाल करने की टीस आदमी के घर लौटने तक नहीं जाती. महिलाएं-बच्‍चों को पता नहीं यह कितनी ज्‍यादा होती होगी. बरसों से देख रहा हूँ ट्रेन में शौचालय इस्‍तेमाल कर पानी छोड़ने के लिए पहलवानी करनी पड़ती है. लोहे के पाइप में लगा दाब-बटन इतना सख्‍़त होता है कि उसे जबरदस्‍त ताकत लगाने पर भी पानी थोड़ा ही आता है और शौचालय पूरा साफ भी नहीं होता. पता नहीं रेल्‍वे को यह क्‍यूँ नहीं समझ में आता. यात्रियों से सफ़ाई और आराम के नाम पर पैसा तो बढ़कर लिया जा रहा है पर पहलवानी है कि कम नहीं होती. खैर, यह एसी-टू का डिब्‍बा, आम डिब्‍बे की बनिस्‍बत साफ़-सुथरा मिला तो राहत मिली और सफ़र शुरू हुआ.

लग रहा था कि लगभग हर स्‍टेशन पर रुकने वाली गाड़ी देर से पहुँचेगी पर अलसुबह सवा-चार बजे जबलपुर पहुँच गयी. स्‍टेशन काफ़ी बड़ा, प्‍लैटफार्म पर बड़ी संख्‍या में सोते लोग और चौतरफ हिन्‍दीनुमा माहोल के बीच मॉं की जगह पहली बार पहुँचने की फुलफुली खु़शी.










ट्रेन में ही जल्‍द उठ सब कामों से निपट प्‍लैटफार्म पर उतरते ही हमने चाय पी. बाहर निकले तो पहले से तैयार इन्‍नोवा गाड़ी तैयार थी. एम पी टूरिज्‍म वालों ने कहा था, साहब आप हमारी सर्विस देखना. इसमें कोई कमी नहीं होगी. इस पर आगे बताऊँगा. पर, ड्राइवर उत्‍तम ने फोन कर पहले ही बता दिया था कि वह बाहर एस बी आई के ए टी एम के बगल में खड़ा है. चाय पी और मॉं की जन्‍मभूमि से पानी भर बाहर निकले और साफ-सुथरी नयी इन्‍नोवा में बैठ कान्‍हा नेशनल पार्क के लिए चल पड़े. कार में बैठने से पहले मॉं की भूमि को प्रणाम कर मन ही मन मॉं को याद किया और उसकी गोद में बैठे एक बालक की तरह गाड़ी में अपने से पूछता रहा कि जबलपुर कैसा है, मॉं का घर कहॉं और कैसा रहा होगा, घर में कौन-कौन रहे होंगे. क्‍या अब भी कोई बुजुर्ग होंगे या नहीं आदि. इसी बीच काफी दूर तक तो जबलपुर एक छावनी की तरह लग रहा था. सरकारी बँगले, आयुध कारखानों की लंबी-चौड़ी दीवारें और अन्‍य कार्यालय. कुछ दूरी तय करने के बाद नदी का पुल, हरे-भरे पेड़, साफ-सीधी सड़कें देख ड्राइवर से जानकारी ली कि 163 किलोमीटर की दूरी तय करनी है. लगभग आधी दूरी पर चाय पीने ड्राइवर रुका. नाम था ‘बालाजी शुद्धशाकाहारी रेस्‍टारेण्‍ट’ याने ढ़ाबा और बालाजी यहॉं भी विराजमान थे. नाम तो ठीक पर इसकी साफ-सफाई देख हमने तो चाय नहीं पी पर कुछ फोटो सड़क से खींच लिये. रास्‍ते के लंबान ऊँचे-ऊँचे पेड़, गेहॅूं के खेत और दूर दिखती पहाड़ियां संकेत दे रही थीं कि जंगल कुछ ही देर में शुरू होने वाला है. इस बीच देखा कि यहॉं बहुत कुछ अब भी लकड़ी पर ही पकाया जाता है. कुछ आदिवासी महिलाएं और छोटी बच्‍चियां सर पर लकड़ी के गट्ठे बॉंध ले जा रही थीं. देड़ घंटे में ही हम शहरी ताम-झाम से दूर दुनिया से कट चुके थे. यहॉं से रफी-लता के पुराने गाने सुनते कान्‍हा की ओर बढ़े और साढ़े तीन घंटे में ही कान्‍हा पहुँच गये.




एकदम सून-सान चौ तरफ. लंबे-ऊँचे घने पेड़ और पक्षियों की अलग-अलग आवाजें. प्रवेश पर रजिस्‍टर में जानकारी दर्ज कर अन्‍दर गये. यहॉं जोर से बात करना, सेल फोन तथा अन्‍य आवाज करने वाले इलेक्‍ट्रानिक चीज़ों के साथगाड़ी से उतरने, किसी प्रकार का कचरा फेंकने की सख्‍त मनाही है (इसका पालन भी हो रहा है). यहॉं कोई ऐसा काम नहीं किया जा सकता जिससे वन्‍य  प्राणियों को तकलीफ़ पहुँचे. तीन किलोमीटर अंदर हमारा ‘किसली-बघिरा हट’ था. रास्‍ते में ही सड़क के पास कुछ हिरण घॉंस चर रहे थे. धीरे गाड़ी रोक उनकी तस्‍वीरें लीं. कुछ ही दूरी पर एक गोरा बंदर हमारे स्‍वागत के लिए सड़क पर लंबी दुम फैलाये अलमस्‍त बैठा था. लगा कि हम उनकी जगह में दखल देने आ गये हैं. बस, कुछ मिनट में ही हम अपने रूम पहुँच गये. पहुँचते ही एम पी टूरिज्‍म के सर्विस के दावों की पोल खुल गयी. ऑफिस का मैनेजर गायब. किसी स्‍टाफ ने पूछना शुरू कर दिया कि आप कौन, क्‍या, साहब आने पर कमरा मिलेगा आदि-आदि. जब मैंने भी आदिम इंसान की झलक दिखायी तो बुक हो रखे कमरे उसने दे दिये. कान्‍हा के भीतर रहने का एकमात्र स्‍थान एम पी टूरिज्‍म का ही है. बाकी व्‍यवस्‍थाएं सब जंगल के बाहर बफर जोन के आस-पास है. इनके यहॉं थ्री स्‍टार स्‍तर के 16 कमरे हैं. कोनों के चार रूम एसी डीलक्‍स और बीच के सब ए सी रूम्‍स. कई मील मांडला जिले से आते हमें रास्‍ते में घर, आदमी, दुकान, कोई ऊँची इमारतें इत्‍यादि नहीं दिखायी दिये. इस जिले से कई छोटी-छोटी नर्मदा की सहायक नदियां निकली हैं और नर्मदा का यह जलसंचय क्षेत्र भी है. अत: कम आबादी और शहरीकरण के चलते यहॉं सब महँगा है. पर जंगल में ठहरने का अनुभव एकदम अलग. पैदल चलना मना, जोर से बात नहीं करना, प्‍लास्‍टीक का इस्‍तेमाल वर्जित, कूड़ा-कागज इधर-उधर फेंकना मना, सेल फोन सिग्‍नल ज़ीरो, रूम में कोई टीवी-वीवी नहीं, किसी प्रकार का संगीत, शोर नहीं आदि. हम तो यह सब देख बहुत खुश हुए पर आजकल अधिकतर लोगों को वजह-बेवजह बात करने और सेलफोन स्‍क्रीन पर अपनी आंखे फोड़ने-ऊँगलिया चलाने का रोग है. ऐसे में मेरे साढ़ू और उनका लड़का थोड़े बेचैन लगे. आजकल जिस आदमी का जितना सेल बजे वह उतना बिज़ी. खुजाने की फुरसत नहीं. आमदनी अठन्‍नी, खर्चा रुपय्या. कुछ पूछो तो एक मिनट फोन पर बात कर रहे हैं, दो मिनट बाद मिलेगें. और एक-दो मिनट बाद फिर वही राग बजना शुरू हो जाता है. कई जरूरी बातें, हालात और कामों को टालने का अच्‍छा ज़रिया है ये सेलफोन ‘व्‍हाट एन आइडिया सर जी’. जिस बच्‍चे के पास स्‍मार्ट फोन या टैब नहीं उसके मॉं-बाप पिछड़े-गरीब और बच्‍चा भोंदू. ऐसे में लोगों का कान्‍हा में आकर बेकल और विचलित होना स्‍वाभाविक ही लगता है. ऐसे में यदि बात करना जरूरी हो तो केवल बी एस एन एल का बहुत मामूली सिग्‍नल फोन में एकआध जगह आता है अन्‍यथा आज भी वहॉं के रिसेप्‍शन में गोल डायल वाला पुराना फोन 10 रुपये प्रति मिनट की दर से करने के लिए रखा है जिसे लोग रेट देखकर कम ही हाथ लगाते हैं.

खैर, रूम मिला और हम सब तैयार हुए, खाना खाकर कुछ दम लिया तो दोपहर के तीन बज रहे थे और हमारी सफ़ारी का टाइम हो चला था. खुली जिप्‍सी खड़ी थी. दोपहर की धूप में हम वापस रिसेप्‍शन गये. अपनी पहचान और रसीद बताकर गाड़ियों की लाइन में लगे भीतर जाने. सभी यात्री बाघ और अन्‍य प्राणियों को देखने उत्‍साहित थे. कई लोगों का पहनावा तो बता रहा था कि वे जंगल घूमने नहीं शिकार करने आए हैं और कोई जानवर आक्रमण कर दे तो पता नहीं ये भागेंगे या रुकेंगे.


कान्‍हा 945 वर्ग किलोमीटर में फैला घना जंगल है. इतना ही इसका बफर जोन भी है. इसे मिलाकर यह 2000 वर्ग किलोमीटर में फैला है जहॉं 25 से अधिक किस्‍म के वन्‍य प्राणी विचरते हैं. लगभग सात तरह के हिरण प्रजाती के प्राणी जैसे सांभर, बारह सिंगा, काले हिरण, स्‍पाटेड डीर तथा अन्‍य में भालू, रींछ, जंगली भैंसा, जंगली बिल्‍ली, जंगली लोमड़ी, चीता, बाघ, मोर, नीलकंठ पक्षी आदि इस जंगल में रहते हैं. इसका फैलाव सुनकर ही मैं सन्‍न रह गया. सोचा कि इतनी बड़ी जगह भी कहीं बची है. रक्षा संगठन में काम करने से 1000-2000 एकड़ भूमि पर बसे कार्यालयों से भली-भॉंती परिचित हूँ पर जंगल इतना विशाल, सोचकर हैरत पर सुखद आश्‍चर्य हुआ. 

इस बीच हमारी गाड़ी का नंबर लगा. मुक्‍की सिंह गाइड हरे यूनिफार्म में हमारी गाड़ी में आकर बैठ गये और हमारी सफारी शुरू हुई. अनुदेश दिया कि गाड़ी से कहीं भी उतरना मना है. तीन-साढ़े तीन घंटे की सफ़ारी में कहीं एक या दो के लिए रुकना हो तो 10-15 मिनट पहले बताना होगा. केवल निर्धारित जगह ही इससे निपटा जा सकता है. सुनते ही मैंने सोचा पानी कम ही पिया जाय तो अच्‍छा है. जिज्ञासा और उत्‍साहवश हम जंगल की जानकारी लेते गये. बताया कि यहॉं 60 से 80 के बीच बाघ हैं. एक बाघ के घूमने का इलाका कम से कम 15 से 20 वर्ग किलोमीटर का होता है. कान्‍हा में केवल 20 प्रतिशत क्षेत्र वन सफारी के लिए रखा गया है. बाकी वर्जित और पूर्णत: संरक्षित है. यह 20 प्रतिशत कुल चार जोन में बँटा है. कान्‍हा, किसली, मुक्‍की और सिरही. इसमें कान्‍हा प्राइम जोन है. यह सुनते ही लगा हम केवल पॉंच प्रतिशत वन ही देख पायेंगे. दिल में जो विचरित बाघ देखने का उत्‍साह था वह ठंडा पड़ने लगा. मैं तो सोचा कि एक साथ चार-पॉंच बाघ खेलते-कूदते और आराम करते आसानी से दिख जाएंगे या हमारी गाड़ी के आगे-पीछे से जाते दिखेंगे. लेकिन जब मुक्‍की ने बताया कि मेल टाइगर के एरिया में दूसरा मेल टाइगर नहीं आता. यदि आ जाए तो दो में से कोई एक बचता है आपसी जंग के बाद. फिमेल टाइगर कहीं भी रह और घूम सकती है. इनके बच्‍चे भी तीन साल में एक बार होते हैं और मॉं अपने बच्‍चों को ढ़ाई-तीन साल तक साथ रखती है. इस दौरान वह उन्‍हें सुरक्षित रखने की दृष्‍टि से जगह-जगह घुमाती है. यदि मेल बाघ पैदा होता है तो उसे मेल टाइगर अपना राज छीन जाने के भय से बचपन में ही मार डालता है. अत: बाघिन यह दो-तीन साल बहुत खूँखार बनी रहती है. मुक्‍की ने यह भी बताया कि लगभग 1000 किलो वाला यह प्राणी बड़ा ही सुस्‍त होता है. जहॉं बैठ गया घंटो या दिनों तक बैठा रहता है. केवल भूखा होने पर ही रात में शिकार करता है. और, शिकार भी कोई हाथ मारते ही उसे हासिल नहीं होता. प्रकृति ने सबकी सुरक्षा और सावधानी की व्‍यवस्‍था की है. बाघ छंलाग लगाकर शिकार करता है. वह बहुत दौड़कर, दूर पीछाकर शिकार नहीं करता. यदि एक कोशिश नाकाम हो जाए तो फिर दूसरी कोशिश नहीं करता क्‍योंकि उसे ऐसा करने में बहुत ताकत लगती है. प्रयास विफल होने पर वह भूखा रहता है पर किसी 5-7 किलो के या छोटे प्राणी का शिकार नहीं करता. जब भी करेगा बड़े प्राणी को मारेगा जिससे दो-चार दिन इस काम से उसे फुरसत मिले. यही कारण है जंगल में अन्‍य प्राणी बाघ के रहते हुए भी रह सकते हैं. यहॉं लगभग 20-25 हजार संख्‍या में हिरण हैं. जगह-जगह झुण्‍ड में दिखायी पड़ जाते हैं.  बारहसिंगा यहॉं की खासियत है. केवल 350 की संख्‍या में हैं. जंगली भैंसा भी पहली बार देखने मिला. इसके पैर सफेद होते हैं. मुक्‍की ने बताया कि बाघ यदि इसका शिकार करे तो यह केवल अपनी सिंघो से उससे लड़ता है. इसमें भी जबरदस्‍त ताकत होती है और बाघ को इससे कड़ी टक्‍कर मिलती है. कई बार बाघ आक्रमण करके भी इसकी ताकत के चलते लौट जाता है. इससे दो बातें मुझे याद आयीं कि ‘देयर इज़ नो शार्टकर्ट इन लाइफ’ तथा ‘काम किये बिना तथा कई बार कई कोशिशें करने पर ही कुछ हासिल हो पाता है’. इस बीच मुक्‍की ने बाघ के बारे में कुछ और भी जानकारी दी कि यदि दो बाघों में लड़ाई हो जाये और कोई गले के नीचे काट दे तो वह बाघ नहीं बचता. दूसरे हिस्‍सों में ज़ख्‍म होने पर वह अपनी जीभ से चाटकर ठीक कर लेता है अथवा वन विभाग के स्‍टाफ को दिखाई देने पर वे उसके इलाज की व्‍यवस्‍था करते हैं. बाघ की भी अधिकतम आयु 15 साल के आसपास होती है. यही कारण है कि इनकी संख्‍या आपसी लड़ाई, तीन-चार साल में एकबार पैदा होने और 15साल के आसपास खत्‍म हो जाने के कारण देश में कम है. जब सिंह और चीता के बारे में पूछा तो मुक्‍की ने बताया कि सिंह और भी आलसी प्राणी है और वह शिकार भी नहीं करता. सिंहनी शिकार कर देती है तो खाता है. चीता दौड़ के शिकार करता है और ऊँची जगहों पर रहना पसन्‍द करता है. जहॉं बाघ होता है वहॉं चीता नहीं होता. याने टाइगर इज़ टाइगर, नो वन एल्‍स. यह सब सुनने के बाद तो जंगल की हर झाड़ी में मेरी ऑंखे बाघ खोज रही थीं. लेकिन, मुक्‍की ने बताया कि जहॉं भी वह होगा उसका संकेत अन्‍य प्राणियों की आवाजों से हो जायेगा. खासकर बंदर बहुत जोर-जोर से चिल्‍लाते हैं जब बाघ घूमता है. नर सांभर भी जोर-जोर से आवाज देते हैं जिससे अन्‍य प्राणी सावधान हो जाते हैं. मेरे कान अब आवाज सुनने के लिए खड़े हो गये थे. हम सबने घूमते हुए सब प्राणी देखे केवल बाघ को छोड़कर. साढ़े छ: बजे तक 40-50 किलोमीटर जंगल में घूमे पर कहीं भी बाघ नहीं दिखा. वापस लौटने पर रूम के पास एक और बंगाली परिवार था जिसने बताया उन्‍हें सुबह की सफारी में टाइगर दिखा था. अब सुबह की बची सफारी में आस जग गयी कि यह सुस्‍त प्राणि है तो सुबह तक वहीं बैठा रहे और हमें दिख जाए. मुक्‍की सिंह रूम से कुछ पहले छोड़कर हमें चला गया पर लहलहाता घना जंगल मेरी आंखों में अब भी घूम रहा था. बाघ नहीं देखने की कसक खुशनुमा जंगल देख पूरी हो गयी. ‘साल’ के ऊँचे-ऊँचे लाखों पेड़, एकदम ताजे हरे पत्‍तों से सने थे. यहॉं अस्‍सी प्रतिशत साल के वृक्ष हैं और अन्‍य में सागवान आदि. पिताजी से सागवान के बारे में हमारे पुराने मकान में रहते हुए जब किसी ने पूछा था कि पंडित जी यह सागवान पर टिका घर कितना मजबूत है तो उन्‍होंने सागवान के बारे में एक कहावत कही थी ‘सौ साल खड़ी, सौ साल पड़ी और सौ साल सड़ी’ याने 300 साल इसकी मियाद या उम्र होती है. यह सुनकर वह साहब चुप हो गये थे और यही बात ‘साल’ के संबंध में मुक्‍की ने हू-ब-हू दोहरायी तो अनायास ही मुझे पिताजी याद आ गये. जंगल निहारते मेरी आंखे हिरणों की तहर यहॉं-वहॉं छलांगे मार रही थी. मन ही मन तो कभी अपनी बेटी से कह रहा था कि इतना घना और गर्मी में हराभरा खूबसूरत जंगल आश्‍चर्य से कम नहीं. 
सन् 70 के दशक में इसे टाइगर प्राजेक्‍ट घोषित करने के बाद लगभग तीस गॉंवों में बसे आदिवासी समुदाय को यहॉं से दूसरी जगह बसाया गया. इससे पहले तक दक्षिण और अन्‍य क्षेत्रों के राजा और नवाबों ने इसे बाघ का शिकारगाह बना रखा था. कहा जाता है कि बिजयनगरम के एक राजा ने यहॉं के तीस बाघ शिकार में उड़ा दिये थे. लेकिन मध्‍यप्रदेश सरकार और वहॉ के निवासियों की दिली तारीफ करनी होगी कि वे जंगल और जानवर को कोई नुकसान नहीं होने देते. इसकी मिसाल यह है कि यहॉं वन विभाग का एक-एक आदमी लगभग 15 किलोमीटर क्षेत्र में प्रतिदिन पैदल चल पहरा देता है. एकदम अकेले और केवल हाथ में एक लाठी लिये हुए. कइयों पर जानवरों ने जानलेवा हमला किया पर ये आज भी निर्भीक और साहस के साथ वन और प्राणियों की रक्षा में लगे हुए हैं. पैदल चलने या गाड़ी के लिए कोई पक्‍की सड़क नहीं. घने वृक्षों के बीच केवल एक चार फीट चौड़ी पगडण्‍डी. नीचे से गुजरने वाले सॉंप, बिच्‍छू और न जाने क्‍या-क्‍या. यहॉं खूब बारीश होती है. अंदाज लगायें ऐसे में यहॉं क्‍या होता होगा. बारिश के दिनों में यात्रियों के लिये यह तीन महीने बंद रहता है. लेकिन इन्‍हें तो इन दिनों में भी जंगल में अपना फ़र्ज अदा करना पड़ता है. मन ही मन मैंने इन्‍हें सेल्‍यूट किया और इनके आगे नतमस्‍तक हो गया. इन्‍हीं सब बातों में खोते हुए रात हो गयी. ‘कान्‍हा’ की एक रात. नींद की जगह रूम की खिड़की से देखती ऑंखे थीं कि कहीं कुछ चमकती बड़ी-बड़ी ऑंखे दिख जाएं. कुछ अनोखा और अद्भुत दिखे. पर, जुगनुओं की चमक से अधिक कुछ और नहीं दिखायी दिया. लेकिन यह अहसास हुआ कि जंगल के इस घने अंधेरे में जुगनू की रोशनी किसी सूरज की किरणपुंज से कम नहीं होती. किसी तरह आराम किया कि सुबह घने वृक्षों के बीच सूर्योदय देखूँगा. साढ़े तीन बजे उठा और तैयार हो गया. पर सुबह साढ़े-पॉंच बजे ही अच्‍छा खासा दिन निकल आया था और हमारे सुबह की सफारी का समय हो गया था. गेट पर तीन किलोमीटर जिप्‍सी में पहुँचे तो देखा कि कई हरे रंग की खास जिप्‍सियां यात्रियों को लिये तैयार खड़ीं थीं. यहॉं चारों जोन में केवल सरकारी (59) जिप्‍सियां ही भीतर भेजी जाती हैं. लगभग 20-20 गाड़ियां एक-एक ज़ोन में. सुबह बाघ और अन्‍य प्राणियों के दिखने की संभावना बहुत अधिक होती है. खुले में वे बाहर आते हैं. इस बीच हमारी 62 नंबर गाड़ी में जगदीश गाइड आकर बैठ गया था. अच्‍छी खासी ठंड के बीच हमारे दॉंत कटकटा रहे थे. हमें गर्मी में इस सुबह की ठंडक का बिलकुल अंदाजा नहीं था. यह ठंड हम पर बिजली की तहर गिरी थी.

गाड़ी में बैठे लग रहा था कि गरम कपड़े भी रखने चाहिए थे. चार घण्‍टे गाड़ी में घूमना था. जगदीश ने बताया कि वह पूरा प्रयास करेगा कि हमें बाघ संभावित जगह ले जाए क्‍योंकि कल की सफारी में केवल उसे ही टाइगर के दर्शन हुए थे. अत: वह उसी दिशा में गाड़ी को ले गया. करीब तीन-चार किलोमीटर भीतर जाते ही नर सांभर की जोर-जोर से आवाज़ आने लगी जिसे गाइड एलर्ट कॉल कहते हैं. सभी शांत और सन्‍न गाड़ी में अपनी-अपनी जगह खड़े हो गये. जगदीश ने सबको शांत कर दिया. लगा कि काम बन गया. परन्‍तु, पॉंच-दस मिनट बाद साथ की दो-तीन गाड़ियां चलनी लगी तो हमारी भी चल पड़ी. मैंने जगदीश से रूकने के लिए कहा पर इससे ज्‍यादा देर रुकने की मनाही है तो हम कुछ नहीं कह सके. बाघ तो नहीं देख सके पर बाघ के हिलने-डुलने भर से जंगल किस तहर हिल जाता है इसकी बानगी देख ली. हम किसली जोन से होते हुए कान्‍हा में जा रहे थे. बहुत भीतर जाने के बाद जब हम कान्‍हा जोन में प्रवेश कर रहे थे तभी मुझे कुछ निशान दिखायी दिये. जगदीश ने तुरंत गाड़ी एकदम धीमी कर दी और कहा कि ये मादा बाघ के ताजा निशान है. लगा कि उसने अभी पगडण्‍डी पार की है. यहॉं भी रूके और धीरे चलते हुए खुले तालाब के पास पहुँचे जहॉं उम्‍मीद थी कि वह आएगा. परन्‍तु हमारे साथ अन्‍य भी निराश और सूखी ऑंखे लेकर आगे बढ़ चले (जगदीश ने बताया कि यह वही तालाब है जहॉं राजा दशरथ ने श्रवणकुमार पर बाण चलाया था). बीच में हमने दो नीलकंठ किनारे बैठे देखे. लग रहा था कि यूँ ही नहीं कहा जाता कि राजा के दर्शन इतने आसानी से होते हैं. मंदिरों में ‘दर्शन’ की घड़ी का अंदाजा तो लगाया जा सकता है पर ‘राजा’ का दर्शन एक दुर्लभ संयोग ही है. खैर, सभी आगे बढ़ चले लेकिन मेरे मन में कसक थी और मैं जगदीश से कह रहा था कि निशान वाली जगह वापस चलें और कुछ देर रुक जाएं. वह माना नहीं और चलते गये. लगभग नौ-साढ़े नौ बजे के बीच जब एक-एक कर जिप्‍सी नाश्‍ते के लिए निर्धारित स्‍थान पर रुकीं तो सबके चेहरे ‘नहीं दिखा’ वाला भाव बता रहे थे. इस बीच हमने पैक लेकर चले नाश्‍ते का लुत्‍फ उठाया और एक ख़बर सुनी की हमारे पीछे आने वाली जिप्‍सी के आगे लगभग देढ़ किलोमीटर तक बाघ सामने चलता रहा और उन्‍होंने उसे जी भर देखा-निहारा. 79 नंबर की जिप्‍सी में सवार ये विदेशी पर्यटक थे. हम उनसे कह भी नहीं सकते थे कि हमें शूट की गयी फिल्‍म दिखायें. मैं मन ही मन झल्‍ला रहा था कि जगदीश गाइड ने मेरी बात नहीं सुनी. क्‍या किया जाय मैं ‘लियो’ और वह ‘टाइगर’. शायद हम दोनों की नहीं जमती इसलिए आगे-पीछे निकल पड़े. दुख नहीं, लेकिन जंगल में इस तरह जानवरों को खुला देख यह बात अवश्‍य लगी कि सच में इन्‍हें कितना मुश्‍किल से बचाकर रखा गया है. इनके लिए प्राणहरों से खुद को बचाना याने जीवन हर दिन, हर पल चुनौती है. किस क्षण, किस प्राणी के साथ क्‍या हो जाय, नहीं पता. लेकिन, जब तक जियो निडर और नि:संकोच जियो. वन प्राणी ‘आनंद’ फिल्‍म में कही राजेश खन्‍ना की बात याद दिला रहे थे कि ‘कल के ग़म को आज की खुशी में शामिल कर, आज की खु़शी ख़राब नहीं करनी चाहिए’. लगभग 11.30 बजे हम अपने कमरे के पास लौट आये. मन में कान्‍हा से विदा होने का अहसास इस बात के साथ जाग गया था कि यहॉं मैं बार-बार आऊँ और उनके बीच कुछ समय गुजारूँ जो जिन्‍दगी ढोते नहीं जीते हैं.

क्रमश: