Tuesday, February 23, 2010

चेतन भगत द्वारा सिम्‍बियॉसिस में दिये गये भाषण का अंश

Speech by Chetan Bhagat at Symbiosis ...


Don't just have career or academic goals. Set goals to give you a balanced, successful life. I use the word balanced before successful. Balanced means ensuring your health, relationships , mental peace are all in good order.
There is no point of getting a promotion on the day of your breakup. There is no fun in driving a car if your back hurts. Shopping is not enjoyable if your mind is full of tensions.

"Life is one of those races in nursery school where you have to run with a marble in a spoon kept in your mouth. If the marble falls, there is no point coming first. Same is with life where health and relationships are the marble. Your striving is only worth it if there is harmony in your life. Else, you may achieve the success, but this spark, this feeling of being excited and alive, will start to die.

One thing about nurturing the spark - don't take life seriously. Life is not meant to be taken seriously, as we are really temporary here. We are like a pre-paid card with limited validity. If we are lucky, we may last another 50 years. And 50 years is just 2,500 weekends. Do we really need to get so worked up?

It's ok, bunk a few classes, scoring low in couple of papers, goof up a few interviews, take leave from work, fall in love, little fights with your spouse. We are people, not programmed devices.

"Don't be serious, be sincere."!

Sunday, February 14, 2010

अच्छे मौक़े का इल्म -- मनोज कुमार (वैलेंटाइन डे पर विशेष)

कभी-कभी वक़्त हमसे बहुत आगे निकल जाता है और हम उसे तलाशते रह जाते हैं। आज एक ख़ास दिन है। जब सारे संसार में यह दिन एक विशेष अवसर के रूप में मनाया जा रहा है तो बात तो कुछ ख़ास होगी ही इस दिन में। इस अवसर पर एक कहानी सुनाने का मन कर रहा है। हमने किसी से सुनी थी। आपको सुनाता हूँ।
उस शहर की वह अगर सबसे नहीं तो एक बहुत ही ख़ूबसूरत लड़की तो थी ही। उसका सहपाठी बहुत ग़रीब था। पर दोनों में दोस्ती गहरी थी। सिर्फ़ दोस्ती। 14 फ़रवरी को उस लड़की का जन्म दिन पड़ता था। पिछले साल उसने अपना जन्म दिन उसी ग़रीब दोस्त के साथ मनाया था। एक ढाबे टाइप के रेस्तरां में कुछ मीठा खा कर। फिर वे पैदल अपने घर को लौट रहे थे तो रास्ते में एक गहनों की दूकान के आगे लड़की के क़दम रुक गये। ग़रीब दोस्त ने पूछा क्या हुआ ? तो उस लड़की ने बताया जब भी मैं इस दूकान के आगे से गुज़रती हूँ तो मेरी नज़र बरबस उस गहने पर टिक जाती है। और मैं सोचती हूँ मेरा वैलेंटाइन ... सच्चा प्रेमी .. किसी दिन आयेगा और उस गहने को मुझे पहनायेगा।
दूसरे दिन वह ग़रीब लड़का उस दूकान पर गया और उस गहने की क़ीमत पता किया। क़ीमत उसके बस के बाहर थी। शायद अपने को बेच भी देता तो उसे ख़रीद नहीं पाता!
आज .. एक साल बाद फिर से 14 फरवरी आ गई। वह ग़रीब लड़का हाथ में एक पैकेट लिये हुए घर से निकलता है। रास्ते में एक लाल गुलाब भी ख़रीदता है। और अपनी उस मित्र के घर पहुंचता है। उसकी दोस्त कहीं जाने के लिये तैयार दिखती है। पूछने पर बताती है कि मेरा एक ख़ास दोस्त आने वाला है। वह मुझे होटल ताज ले जा रहा है। मेरा स्पेशल जन्म दिन मनायेगा वह। ग़रीब लड़का वह पैकेट वहीं टेबुल पर रख देता है और हैप्पी बर्थ डे टू यू बोल कर लाल गुलाब छुपाते हुए वहां से निकल आता है। उसे पता भी नहीं चलता कि जब वह निकल रहा था तो कोई भीतर घुस रहा था।
जो भीतर प्रवेश करता है वह शहर के सबसे धनी व्यक्ति का पुत्र है और ख़ुद एक होस्पिटल और ब्लड बैंक का मालिक है। वह अपना क़ीमती तोहफ़ा उस लड़की को प्रज़ेंट करता है। फिर पूछता है वह जो लड़का अभी यहां से गया है वह कौन था और क्यों आया था? लड़की बताती है मेरे साथ पढता है और मुझे बर्थ डे विश करने आया था और यह गिफ़्ट दे गया है। धनी लड़का बोलता है ज़रा खोलो तो देखें क्या है? लड़की पैकेट खोलती है तो उसे पिछले साल का वक़या याद आ जाता है। उसमें वही हार होता है? उसके मुंह से निकलता है इतना क़ीमती हार वह कहां से लाया? इस पर धनी लड़का बोलता है मुझे मलूम है। वह पिछले एक साल से मेरे होस्पिटल में नाइट ड्यूटी कर रहा है... वार्ड की साफ़-सफ़ाई की ... और हर रविवार को अपना ख़ून भी बेचता रहा है। पर उसने पैसे कभी नहीं लिये। हमेशा बोलता था इसे अपने पास ही रखिये। एक ज़रूरी समान ख़रीदना है। अभी कल ही उसने सारे पैसे लिये थे। लगता है इसी गिफ़्ट को ख़रीदने के लिये वह पैसे जमा कर रहा था। लड़की उस ग़रीब लड़के को खोजने बाहर निकलती है पर वह बहुत दूर जा चुका होता है।सच है हमें तब तक किसी अच्छे मौक़े का इल्म नहीं होता जब तक वह हमारे हाथों से निकल नहीं जाता। आप मत निकल जाने दीजिए।
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टिप्‍पणी : बड़े लोग अक्‍सर कहा करते हैं, ध्‍यान से सुनो, इसे याद रखो...... बहुत ही बढ़िया 'वाक़िया' आज के इस अवसर पर आपने याद फर्माया. मेरे लिए भी यह अब ज़हनिशां बन चुका है. बल्‍िक, अपने ब्‍लाग के ज़रिये इसे और भी पाठकों के ज़हन में लाने का यत्‍न करूँगा. यदि वाक़ये में उद्धृत जैसे पात्र वैलेंटाइन डे मनायें तो कोई हर्ज नहीं होना चाहिए बल्‍कि यह दिवस ही ऐसे समर्पित प्रेमियों के लिए है.
इन पर भौगोलिक सीमाएं और सामाजिक बन्‍धन लागू नहीं होते. बढ़िया. अच्‍छे वाकिये और अच्‍छी रचना के लिए बधाई !

होमनिधि शर्मा

Saturday, February 13, 2010

'ब्लेसिंग' लघुकथा , समीक्षा और टिप्‍पणी


ब्लेसिंग 

-- मनोज कुमार

में आई कम-इन सर?
यस कम इन।
गुड मार्निंग सर।
मार्निंग
कैन आई सिट सर?
ओह यस-यस प्लीज ।..................अरे तुम ? अगर तुम अपने ट्रांसफर की बात करने आए हो, तो सॉरी, तुम जा सकते हो।
नहीं सर मैं तो...आपके...........।
देखो तुम जब से इस नौकरी में हो, यहीं, इसी मुख्यालय में ही काम करते रहे हो। तुम्हारे कैरियर के भले के लिए तुम्हें अन्य कार्यालय में भी काम करना चाहिए। और गोविन्दपुर में जो हमारा नया ऑफिस खुला है , उसके लिए हमें एक अनुभवी स्टाफ की आवश्यकता थी। हमें तुमसे बेहतर कोई नहीं लगा।
सर मैं तो इस विषय पर बात ही नहीं करने आया। मैं तो उसी दिन समझ गया था जिस दिन ट्रांसफर ऑर्डर निकला था कि आपने जो भी किया है मेरी भलाई के लिए ही किया है। मैं तो कुछ और ही बात करने आया हूँ।
ओ.के. देन ... बोलो...............।
सर वो,.............थोड़ा लाल बत्ती जला देते । कोई बीच में न आ जाए।
देखो तुम घूम-फिर कर कहीं ट्रांसफर वाली बात तो नहीं करोगे।
नहीं सर। बिल्कुल नहीं। कुछ पर्सनल है सर।
क्या?
सर मेरे पिता जी काफी बूढ़े हो गए हैं। उनकी इच्छा थी कि मैं एक गाड़ी खरीदूँ और उन्हें उस गाड़ी में इस पूरे महानगर में घुमाऊँ।
तो इसमें मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूँ ?
सर ! बस आपकी ब्लेसिंग चाहिए। आप तो इसी महीने के अन्त में सेवानिवृत होकर चले जाएंगे। सुना है आपके पास एक गाड़ी है।
हां है तो। वो 80 मॉडल गाड़ी हमेशा गराज में पड़ी रहती है।
सर उसे .....आप ............।
अरे बेवकूफ वो तुम्हारे किस काम आएगी। पिछले चार सालों में उसकी झाड़-पोछ भी नहीं की गई है। उसे तो कोई पांच हजार में भी नहीं खरीदेगा। उससे ज़्यादा तो उसे मुझे अपने होमटाउन ले जाने का भाड़ा लग जाएगा। मैं तो उसे यहीं छोड़................।
सर मैं खरीदूंगा सर। आप बीस हजार में उसे मुझे बेच दीजिए।
पर...................लेकिन .......गराज..........नहीं ...नहीं।
सर। प्जीज सर। नई गाड़ी तो मेरी औकात के बाहर है। कम से कम इससे मैं अपने माता-पिता का सपना उनके प्राण-पेखरू उड़ने के पहले पूरा तो कर लूंगा।
यू आर टू सेंटिमेंटल टूवार्डस योर पैरेंट्स। आई शुड रिस्पेक्ट इट। ओ.के. ... डन। आज से, नहीं-नहीं अभी से गाड़ी तुम्हारी।
थैंक्यू सर।... पर एक प्रॉब्लम है सर।
क्या?
आपकों तो मालूम है कि मैं गाड़ी चलाना ठीक से नहीं जानता। नया-नया सीखा हूं। अब मेरे घर, माधोपुर से तो इस ऑफिस तक का रास्ता बड़ा ठीक-ठाक है, भीड़-भाड़ भी नहीं रहती, किसी तरह आ जाऊंगा। पर सर आप तो जानते ही हैं कि गोविन्दपुर का रास्ता....................... वहां तो शायद मैं इस कार को नहीं ले जा पाऊँगा।
दैट्स ट्रू। ब्लडी दैट एरिया इज भेरी बैड। पूरा रास्ता टूटा-फूटा है। उस पर से भीड़ भाड़, .... यू हैव ए प्वाईंट।...............मिस जुली.......जरा इस्टेब्लिशमेंट के बड़ा बाबू को ट्रांसफर ऑर्डर वाली फाईल के साथ बुलाइए।
थैंक्यू सर। गुड डे सर।
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परशुराम राय जी मूलत: अध्‍यापक का स्‍वभाव रखते हैं और गाहे-बगाहे उन्‍हें यह कार्य करते हुए भी देखा है. आयु और अनुभव के मामले में भी वे मनोज जी और हमसे बड़े और अनुभवी हैं. चर्चा और बातचीत करते हुए किसी भी विषय के हमेशा मूल में जाना और वहॉं से आगे बढ़ना उनका एक स्‍वाभाविक गुण है. इसी कारण वे एक सुलझे हुए होमियोपैथ चिकित्‍सक भी हैं जो उन्‍होंने अपने स्‍वाध्‍याय से सीखकर आर्डिनेन्‍स फैक्‍ट्री, मेदक, आन्‍ध्र-प्रदेश में लगभग 20 वर्षों तक मुफ्त चिकित्‍सा सेवा की. सामान्‍यत: हम किसी डॉक्‍टर, वकील आदि पेशेवर व्‍यक्‍ितयों के पास जाते हैं तो पहले यह पता कर लेते हैं कि क्‍या वह अपने काम आयेगा अथवा नहीं. लघुकथा पर की गयी टिप्‍पणी पर भी अपनी बात करने से पहले मुझे यह आवश्‍यक लगा कि समीक्षक को थोड़ा जान-पहचान लें तो उनके द्वारा की गई समीक्षा की मौलिकता, मान्‍यता और प्रामाणिकता का महत्‍व ज्‍यादा सहजता से स्‍वीकार्य और ग्राह्य हो पायेगा.
मैंने मूल कथा और समीक्षा दोनों ही पढ़ीं. मेरे विचार से किसी भी रचना की अच्‍छी समीक्षा वही हो सकती है जिसमें पाठक और समीक्षक को लगभग एक समान प्रतीती होती है. ऐसा ही कुछ राय साहब की समीक्षा पढ़कर लगा. बिल्‍कुल एक चिकित्‍सक की भॉंती या डाक्‍टरी ज़बान में कहूँ तो बड़ी क्‍लिनिकल एनालिसिस इस लघुकथा की राय साहब ने की है. इस टिप्‍पणी के माध्‍यम से मनोज कुमार जी को एक कथाकार के रूप में और राय साहब को एक समीक्षक के रूप में उभर कर आने के लिए बधाई प्रेषित करता हूँ. आए दिन कुछ-न-कुछ पढ़ना होता ही रहता है लेकिन जो ईमानदार प्रयास गंभीरतापूर्वक इस माध्‍यम से किया जा रहा है वह तहेदिल से बधाई का हक़दार है.
जहॉं तक लघुकथा को परिभाषित करने का प्रश्‍न है यह 'लघुकथा' नामकरण से ही जाहीर हो जाता है जैसे फिल्‍म और लघुफिल्‍म. याने कथा मगर छोटी. सामान्‍यत: कथा नाम से रामायण जैसी लंबी कथा का आभास होता है. अत: कहानी के अंग धारण कर संक्षेप में कथा कहना लघुकथा कहा जा सकता है.

मेरी दृष्‍िट में कहानी शब्‍द 'कहना' से बना है जबकि कथ से कथित और कथन तथा कथा. अत: दोनों की आब्‍जेक्‍टिविटी में अंतर ज्ञात पड़ता है. कथन में कोई पहले से कही हुई बात कथा के ज़रिये संदेश के रूप में साबित होती हुई नज़र आती है तो कहानी में घटनाएं विषयानुसार या कथानक अनुसार एक क्रमागत रूप में कही जाती हैं, और इनके बहाने कोई सीख सामने आती है. समीक्षित लघुकथा में भी 'ब्‍लेसिंग' शीर्षक से ही बिना पूरी कथा पढ़े यह बात समझ में आ जाती है कि कहानी का अंत इसी के असर को साबित करेगा कि 'ब्‍लेसिंग' ही इस कथा के मूल केन्‍द्र में है जो अंत में सिद्ध होता है.

कुल मिलाकर मेरी ऐसी प्रतीती है.

पुन: एक बार इस ब्‍लाग के प्रत्‍येक सदस्‍य को बधाई और शुभकामनाएं.


होमनिधि शर्मा

Sunday, January 31, 2010

शनिवार, ३० जनवरी २०१०

श्रद्धांजलि, बापू


बापू के निर्वाण दिवस पर
श्रद्धांजलि, बापू
परशुराम राय





राजघाट पर अब भी,
बापू,
अग्निकुण्ड में
सत्य, अहिंसा की ज्वाला
जलती है,
या लगता है
सत्य, अहिंसा के
सजल नयन से
बापू!
देख रहे तुम भारत को।
ये ही दोनों कदम तुम्हारे
अन्तरिक्ष से
नाप रहे -
भारत की धरती।
पूर्वाग्रहों की जड़ता को
नाम दिया
सत्याग्रह का-
उत्तराधिकारी
जो बताते आपका,
अपनी ही
गलती से
गलती करना
सीख रहे हम।
तलवार गलाकर
तकली गढ़ी जो आपने
कब की बन गई
फिर तलवारें।
प्रजातंत्र के तीनों बन्दर
अब तो
न अपनी बुराई करते हैं
न सुनते हैं और न ही
देखते हैं।
उनकी मंगलवाणी भी
करती
अमंगल घोषणा।
किंकर्त्तव्य-विमूढ़ हो
भारत
दे रहा तुम्हें
श्रद्धांजलि
बापू!
दे रहा तुम्हें
श्रद्धांजलि, बापू
श्रद्धांजलि, बापू।
---0---राय साहब,
जैसे मैंने पहले कहा था कि जहॉं व्‍यक्‍ित, विचार या कविता अलग नहीं होते  वहॉं.....
'शोला हूँ, भड़कने की गुजारिश नहीं करता.
 सच मुँह से निकल जाता है, कोशिश नहीं करता'.


स्‍पष्‍टवादी परशुराम यदि आज गॉंधी के हिन्‍दुस्‍तान को देखेंगे तो शायद हम सबको ऐसा ही देश दिखाई देगा. यह कविता नहीं गॉंधी और उनके दर्शन की तरह आज के सच का निचोड़ है.

जहाँ कवि और कविता एक हो जाए तो कहने को कुछ नहीं रह जाता.

बापू से आशीष मॉंगते हुए कि वे हम सबको सद्बुद्धी दें.


होमनिधि शर्मा.

Saturday, January 23, 2010

'श्रद्धा की मधुशाला के बहाने'


डा. हरिवंश राय बच्चन की पुण्य तिथि १८ जनवरी पर श्रद्धांजलि - परशुराम राय, आर्डिनेंस फैक्‍ट्री, कानपूर


साकी बाला के हाथों में
भरा पात्र सुरभित हाला
पीने वालों के सम्मुख था
भरा हुआ मधु का प्याला
मतवालों के मुख पर फिर क्यों
दिखी नहीं थी जिज्ञासा
पीने वाले मतवाले थे
फिर भी सूनी मधुशाला ।। 1 ।।



मधु का कलश भावना का था
नाम आपका था हाला
पीने वाले प्रियजन तेरे
कान कान था मधुप्याला
तेरी चर्चा की सुगंध सी
आती थी उनके मुख से
यहॉ बसी थी तेरी यादें
और सिसकती मधुशाला ।। 2 ।।



छूट गए सब जग के साकी
छूट गई जग की हाला
छूट गए हैं पीने वाले
छूट गया जग का प्याला
बचा कुछ भी, सब कुछ छूटा
जग की मधुबाला छूटी
छोड़ गए तुम अपनी यादें
प्यारी सी यह मधुशाला ।। 3 ।।



मृत्यु खड़ी साकी बाला थी
हाथ लिए गम का हाला
जन-जन था बस पीनेवाला
लेकर सॉसों का प्याला
किंकर्तव्यमूढ़ सी महफिल
मुख पर कोई बोल थे
चेहरों पर थे गम के मेघ
आँखों में थी मधुशाला ।। 4 ।।



पंचतत्व के इस मधुघट को
छोड़ चले पीकर हाला
कूच कर गए इस जगती से
लोगों को पकड़ा प्याला
बड़ी अजब माया है जग की
यह तो तुम भी जान चुके
पर चिंतित तू कभी होना
वहाँ मिलेगी मधुशाला ।। 5 ।।



वहाँ मिलेंगे साकी तुमको
स्वर्ण कलश में ले हाला
इच्छा की ज्वाला उठते ही
छलकेगा स्वर्णिम प्याला
करें वहॉ स्वागत बालाएँ
होठों का चुम्बन देकर
होगे तुम बस पीने वाले
स्वर्ग बनेगा मधुशाला ।। 6 ।।



मन बोझिल था, तन बोझिल था
कंधों पर था तन प्याला
डगमग-डगमग पग करते थे
पिए विरह का गम हाला
राम नाम है सत्य बोला
रट थी सबकी जिह्वा पर
अमर रहें बच्चन जी जग में
अमर रहे यह मधुशाला ।। 7 ।।



दुखी न होना ऐ साकी तू
छलकेगी फिर से हाला
मुखरित होंगे पीने वाले
छलकेगा मधु का प्याला
नृत्य करेंगी मधुबालाएँ
हाथों में मधुकलश लिए
सोच रहा हूँ कहीं बुला ले
फिर से तुमको मधुशाला ।। 8 ।।



क्रूर काल साकी कितना हूँ
भर दे विस्मृति का हाला
खाली कर न सकेगा फिर भी
लोगों की स्मृति का प्याला
इस जगती पर परिवर्तन के
आएँ झंझावात भले
अमर रहेंगे साकी बच्चन
अमर रहेगी मधुशाला ।। 9 ।।



अंजलि का प्याला लाया हूँ
श्रद्धा की भरकर हाला
भारी मन है मुझ साकी का
ऑखों में ऑसू हाला
मदपायी का मतवालापन
ठहर गया क्यूँ पाता नहीं!
अंजलि में लेकर बैठा हूँ,
श्रद्धा की यह मधुशाला ।। 10 ।।

नमस्‍कार राय साहब,
यह ब्‍लाग (मनोज) तो आप ही के ज़रिये आज पढ़ने को मिल रहा है. सच कहूँ तो आपकी इस रचना का बड़ा इंतज़ार था. शायद शुरू के दो-तीन लोगों में मैं रहा हूँगा जिसे यह रचना आपने लिखते ही सुनाई थी. आज जैसे ही रचना देखी लगा आप सामने सोफे पर आमने-सामने बैठे रचना सुना रहे हों. सारी स्‍मृतियॉं एक चलचित्र बनकर ऑंखों के आगे चल रही हैं. संभवत: रचना सुनाने का समय भी इतनी ही रात्रि का रहा होगा. मुझे याद है यह रचना आपने रेल यात्रा करते समय लिखी थी. वह भी शायद बच्‍चन जी की पुण्‍यतिथि पर. मेरे अब तक की साहित्‍यिक गतिविधियों के दौरान शायद ही इतनी सटीक रचना बच्‍चन जी की मधुशाला या उनके जीवन के फलसफे पर किसी ने लिखी होगी. यह कहूँगा कि हम सब मिलकर जैसी श्रद्धांजलि बच्‍चन जी को देना चाहते थे वह आपने इसे लिखकर दे दी है. हम सब इस खास रचना के लिए आभारी हैं. मैं इस ब्‍लाग के माध्‍यम से लिखना चाहूँगा कि भले ही कम रचनाएं आपने लिखीं होंगी पर उन रचनाओं का शिल्‍प, कथ्‍य और गांभीर्य पाठक में एक पात्रता की मॉंग करता हैं. रचनाएं पढ़कर पाठक को लगता है कि मेरा भी क्‍लास ऊँचा हो गया है. बहुत तीव्र अनुभूतियॉं आपके काव्‍य में मैंने महसूस की हैं, बल्‍िक कहूँगा कि आधुनिक काव्‍य में शास्‍त्रीय ढंग से बिम्‍बों का प्रयोग बहुत कम ही कवि इतने ढंग से कर पाते हैं. मुझे याद है आप कविता समझने का तरीका भी बताया करते थे. यह कोरी प्रशंसा नहीं अपितु दशाधि वर्षों से भी अधिक समय से आप से जुड़े रहने और कई घण्‍टों व दिनों की चर्चाओं के बाद यह कह रहा हूँ. मुनासिब बात कहना और मुनासिब व्‍यवहार करना यह आपका स्‍वभाव है जो आपकी रचनाएं बोलती हैं. जब कविता बोलने लग जाए तो समझने के लिए कुछ अधिक शेष नहीं रह जाता. रह जाता है तो बस उसे अपनाना.

आपकी और भी रचनाओं, खासकर अन्‍यान्‍य विषयों पर लेखों की प्रतीक्षा है. आशा है आप अपने विचारों से हमें लाभान्‍वित करते रहेंगे. मनोज कुमार जी को भी बधाई कि बहुत सराहनीय कार्य यह ब्‍लाग आरंभ कर उन्‍होंने किया है. यह उनका ब्‍लाग नहीं बल्‍िक हम सबका ई-चबूतरा है जिस पर हमसब साथ नहीं बैठते बल्‍कि हमारे लिखे विचार बैठ बतियाते हैं.

होमनिधि शर्मा

Monday, January 18, 2010

राजभाषा कार्यशाला के बहाने महबूबनगर और 'पिल्‍ललमर्री'

दिनांक 7 जनवरी को महाप्रबंधक, बीएसएनएल के निमंत्रण पर महबूबनगर जाना था. सुबह 7.40 बजे काचीगुड़ा रेल्‍वे स्‍टेशन से मैं और रामचन्‍द्रन जी रेलगाड़ी में सवार हुए और गाड़ी महबूबनगर चल पड़ी. महबूबनगर की यह मेरी पहली यात्रा थी. मैं उत्‍सुक था कि दो घण्‍टे के सफ़र से आन्‍ध्र-प्रदेश के एक जिले तक पहुँचा जा सकता है. वह भी मात्र 35 रु का रेल किराया देकर. स्‍टेशन पर लगभग तीन-चार सौ लोग खडे़ थे. तुंगभद्रा एक्‍सप्रेस जो कर्नुल तक जाती है सिकंदराबाद से चलती है और लगभग वहीं से भर जाती है. श्रीमती गायत्री, बी एस एन एल की हिन्‍दी अधिकारी ने हमें पहले ही बता दिया था कि शायद काचीगुड़ा से सीट ना मिले. चूँकि 74 वर्षीय युवामन रामचन्‍द्रन जी मेरे साथ थे सो मैं अपने से आधी उम्र का बनकर तैयार खड़ा था कि जैसे ही गाड़ी की गति धीमी हो जाए और चलती गाड़ी में चढ़ने लायक स्‍िथति बनेगी मैं चढ़ जाऊँगा और वैसे ही किया. नतीजतन मात्र तीन-चार सीटें डिब्‍बे में खाली थी सो दो पर हम काबिज़ हो गये. सुबह-सुबह मेरे सहयोगी राजभाषाकर्मी श्री करण 6.30 बजे घर आ गए थे स्‍टेशन छोड़ने और हम कानबजती ठंड में स्‍टेशन निकल पड़े. ठंडा पानी नहाने की आदत के बावजूद ठंड काट रही थी. स्‍टेशन पहुँचते ही रामचन्‍द्रन जी ने नाश्‍ते और काफी की पेशकश की तो मैं इन्‍कार नहीं कर सकता था सो पार्सल नाश्‍ता लेकर फुट ओवर ब्रिज चढकर अगले प्‍लैटफार्म पर गए. वहीं ठहरे-ठहरे मैंने नाश्‍ता किया और बाद में दोनों ने गरम काफी पी ही थी कि गाड़ी आ गयी और हम चल पड़े.  

इस दौरान बहुत कुछ अनुभव हुआ. यात्रा चाहे छोटी हो या बड़ी तैयारी उतनी ही करनी पड़ती है. यहॉं भी जाते समय हाथ में सूटकेस छोड़ सबकुछ था. कई यात्राएं की होंगी परन्‍तु हमेशा एक दिन पहले से दिल-ओ-दिमाग यात्रा करना शुरू कर देता है. कौनसे कपड़े पहनने हैं. सुबह उठकर दाड़ी जरूर बनानी है. जूते पालिश हुए या नहीं. पर्स में पैसे पर्याप्‍त हैं या नहीं. पेट ठीक रखना है. कोई जरूरी दवाई हो तो उसे भी साथ रखना है. इनके अलावा क्रेडिट कार्ड, आई-कार्ड रखा है या नहीं आदि-इत्‍यादि. और इन सब पर घर वाले भी मानसिक रूप से तैयार रहेंगे कि रेल से बाहर जा रहे हैं. आप हैदराबाद में रोज 50 कि.मी. दूर जाएं-आएं उतनी मानसिकता प्रभावित नहीं होती जितनी कि सुरक्षित रेल यात्रा पर जाने से होती है. साधन और स्‍थान कितना असर डालते हैं यह महसूस किया जा सकता है.

तेलंगाना का ज्‍वलंत मुद्दा भी रेल में बैठते समय दीमाग में था. लगभग 12 वर्ष भानूर में काम करने से मेदक जिले के इलाकों और वहॉं के हालात का कुछ पता था तो इसी प्रकार बचपन से करीमनगर और निजामाबाद जाते-आने रहने से इन जिलों और यहॉं के गॉवों का हालचाल भी थोड़ा-बहुत पता था पर लोगों की भीड़ बता रही थी कि महबूबनगर इनसे कुछ हटकर है. सुना और देखा था कि लोग बंबई-पूना रोज आते-जाते हैं. यहॉं भी देख ऐसा ही लग रहा था. पर सवाल था कि महबूबनगर से लोग हैदराबाद आएं समझ में आता है पर यहॉं से महबूबनगर जाएं समझ में नहीं आ रहा था. खैर, कुछ ही देर में यह जिज्ञासा शांत हो गयी. मेरे बगल में एक व्‍यापारी और एक विद्यार्थी बैठा था और रामचन्‍द्रन जी के बाजू संयोग से बीएसएनएल का ही एक अधिकारी और एक विद्यार्थी. बातचीत सुनकर पता लगा कि महबूबनगर में राज्‍य और केन्‍द्र सरकार के कार्यालयों में काम करने वाले अधिकतर लोग इस रेल से आवा-जाही करते हैं और बच्‍चे इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई के लिए जाते-आते हैं. रेल का माहोल पूरी तरह सरकारी. कुछ लोग अखबार पढ़ रहे थे. कुछ तेलंगाना-आन्‍ध्रा चर्चा. कुछ वेतन संशोधन की तो कुछ अपने-अपने साइड बिजनेस या फिर बच्‍चों की पढ़ाई-लिखाई व अपने ट्रान्‍सफर के विषयों पर बातचीत कर रहे थे. ट्रेन में एक बात दिखाई दी. बास और सब-आर्डिनेट यात्री और सहयात्री थे. इनके सुख-दुख एक समान होने के कारण व्‍यवहार में आदमीयत दिखाई दे रही थी. अन्‍यथा बॉसेज की गर्दने और भौंए अक्‍सर तनी हुई रहती हैं.  इनके लिए अक्‍सर अपना दुख, दुख होता है पर दूसरे का दुख अक्‍सर परेशानी अड़चन और बहाना. बीच-बीच में रामचन्‍द्रन जी से भी बात हो रही थी. वे भी अपने सात-आठ वर्ष महबूबनगर जाने-आने के अनुभव सुना रहे थे.

यह सब देख-दिखाते रेल में गरमा-गरम समोसे, जाम (अमरूद), शू-पालीशवाला, इडली-वडेवाला, चाय-काफी, पानीवाला अपने-अपने खास अंदाज में आते रहे और हम खुशबू सूंघते महबूबनगर पहुँच गए. शुरू में तो गाड़ी धीमे चली. लग रहा था देर हो जाएगी. पर स्‍टेशन पहुँचकर समय देखा तो 10.15 बजे थे. लोग खुश थे. समय से पहुँचने पर. फुटओवर ब्रिज पार कर बाहर निकले. गायत्री जी अगुवाई के लिए खड़ीं थी. गाड़ी में बैठे रोड पार बी एस एन कार्यालय था. ठंड कम हो चुकी थी. सो हम दोनों एक-एककर सबसे पहले बाथरूम जाकर अपने-अपने स्‍वेटर उतार सो-काल्‍ड खुद को गेस्‍ट बनाकर बाहर निकले और सीधे सम्‍मेलन कक्ष गए. समय हो चुका था. प्रोजेक्‍टर लगा था. इंतेजाम के मुताबिक पेनड्राइव से प्रेसेंटेशन और फाण्‍ट लोड कर चेक कर लिया. इतने में जीएम के यहॉं से मिलने का बुलावा आया. परिचय हुआ. जी एम देखते ही गैर-हिन्‍दी भाषी लगे. रंग-रूप से यहॉं के स्‍थानीय निवासी. परिचय हुआ. चाय आयी. बातचीत में खुले तो पता चला कि कन्‍याकुमारी से कश्‍मीर तक सभी बड़े शहरों में उनकी पोस्‍टिंग हो चुकी है. हम दोनों की प्रस्‍तुति के विषयों के बारे में जानकारी ली. मेरा विषय संसदीय राजभाषा समिति और उसकी प्रश्‍नावली था. इसीसे जुड़ा सन् 2008 के आखिर का श्रीनगर का वाकिया  उन्‍होंने सुनाते हुए बताया कि उनके वहॉं प्रधान रहते हुए समिति आयी थी. संयोजनकर्ता भी वही थे. और, श्रीनगर होने के कारण सुरक्षा इंतेजाम और अन्‍य व्‍यवस्‍थाएं कितनी मुश्‍किलें पैदा करती हैं इसका जिक्र  भी किया. कड़े सुरक्षा बंदोबस्‍त के बीच 13 एम पी सदस्‍य और सचिवीय सहयोगी पहुँचे जिनके इंतेजामात पर लाखों में खर्च आया और जिस दिन निरीक्षण बैठक हुई उसमें बी एस एन एल की ओर से कोई मुरलीधर नाम के वरिष्‍ठ अधिकारी मौजूद थे जिनके हस्‍ताक्षर प्रश्‍नावली में थे. बातचीत-चर्चा कई बातों पर हुई परन्‍तु ये अहिन्‍दी भाषी मुरलीधर के हस्‍ताक्षर देख अध्‍यक्ष महोदय बिफर गए और सख्‍त लहजे में पूछ बैठे कि आपने अपने हस्‍ताक्षर के आखरी तीन अक्षर अलग क्‍यों लिखे हैं और इनका क्‍या अर्थ होता है बताएं. उन्‍होंने murli dar लिखा था जिसमें अंतिम तीन अक्षरों से वहाँ के मुस्‍लिम बिरादरी की पहचान होती है जबकि धर dhar लिखने पर हिन्‍दु बिरादरी की. यह एक आम तरीका है नाम से बिरादरी पहचानने का. डार मुस्‍लिम बिरादरी तो धर समूचे पंडित बिरादरी (हिन्‍दू) की पहचान है. वे पूछ बैठे कि आप क्‍या हैं और क्‍या लिख रहे हैं. बड़ी मुश्‍किल से मुरलीधर महोदय ने उन्‍हें यह कहते हुए शांत किया कि दक्षिण प्रांत में यह इसी तरह स्‍पेल किया जाता है अत: यह मुरलीधर ही है मुरलीडार नहीं. तात्‍पर्य यह कि गए थे सीखाने, पहले सीखने मिल गया. अपनी तो चॉंदी हो गयी. शायद महबूबनगर नहीं जाता तो यह बात इतनी तफसील से जानने को नहीं मिलती. दूसरे वहॉं भोजन का इंतजाम. लगभग सभी मॉंसाहार का प्रयोग करते हैं और समिति के लिए शुद्ध शाकाहारी भोजन और बनानेवाला एक कड़ी चुनौती रही यह जानने को मिला. तीसरा जम्‍मू-श्रीनगर जाने वाले अपने परिवार को सुरक्षा कारणों से यहीं छोड़कर जाते हैं तथा ये सभी वहॉं के निवासियों के लिए केन्‍द्र सरकार के कारिंदे याने भारत सरकार के हैं, गैर-मुल्‍की. उनका फर्ज बनता है कि वे उनकी सेवा करें और जब वे रिवाल्‍वर-बन्‍दूकें लेकर कनपट्टी पर रख दें तो सह जाएं. माहोल काफी गंभीर हो चला था और कार्यशाला का समय भी.

इस बीच लगभग 11.30 बजे कार्यशाला आरंभ हुई. जी एम ने उद्घाटन में कई बातें दोहरायीं. इसके बाद मैंने और रामचन्‍द्रनजी ने एक-एककर अपने-अपने विषयों पर प्रस्‍तुति-सज्‍जित व्‍याख्‍यान दिये. बहुत ही अच्‍छे माहोल में बातचीत और चर्चा हुई. स्‍वयं जी एम महोदय विषय और प्रस्‍तुति से मुत्‍तासिर होकर पूरे 2.15 बजे तक बैठे रहे.  इसके बाद हमें भोजन के लिए एकमात्र उपलब्‍ध शाकाहारी होटल ले जाया गया. यहॉं बीएसएनएल की ओर से एक एजीएम और स्‍वयं गायत्री जी उपस्‍थित थीं. 


खाने के बाद दो घण्‍टे का समय बचा था. ए जी एम साहब ने कहा कि यहॉं पास में एक पर्यटन स्‍थल 'पिल्‍ललमर्री' है. देखने जाएंगे. मुझे कुछ नाम समझ में नहीं आया. रामचन्‍द्रनजी ने समझाया पर जब दो-तीन किलोमीटर दूर जगह पहुँचकर देखा तो एकदम सुख्‍ाद आश्‍चर्य हुआ. बच्‍चे वाला बड़ का पेड़.टिकट लेकर हम पेड़ देखने प्रवेश करे. पेड़ देखते ही एकदम बचपना दिल में कुलबुली करने लगा. इतना खूबसूरत और इतना बड़ा कि पेड़ पर चढ़ने, घॉंस पर बैठने-लोटने का मन करने लगा. लगभग चार एकड़ में फैला पेड़. यह सात सौ वर्ष पुराना वृक्ष है जिसकी हजारों शाखाएं झुकती हुई ज़मीन में समा गयीं और वहीं से एक-एक वृक्ष बनकर निकल पड़ीं. कई शाखाओं को काटकर पगडण्‍डी नुमा रास्‍ता बनाया गया है. मन तो कर रहा था कि वहीं दो-चार घण्‍टे लेट लूँ. काश गरमागरम खाना यदि बनाकर लाते और सब बैठकर खाते तो मज़े का अंदाजा लगाइए. पेड़ जैसे अपनी बाहें फैलाकर हमें बुला रहा था. अपनी आगोश में लेने पता नहीं कबसे खड़ा इंतज़ार कर रहा था. पूरा चमन खाली था. केवल हम चार लोग थे. गायत्री के कहने पर हमने कुछ तस्‍वीरें भी लीं. मैंने कहा मज़ा आ गया. यहॉं न आते तो यात्रा अधूरी रह जाती. इसी को लगे बाजू जमीन के टुकड़े पर छोटा डीर पार्क है. वह भी देखे. सब सूखा दिखाई दे रहा था. कहीं कुछ हरा-भरा नहीं था. एकदम चौंक गया. यह क्‍या दीवार के एक तरफ इतना हरा-भरा और घना पेड़ और दूसरी तरफ एकदम तड़की ज़मीन और खाने को तरसते तीन हीरण. बड़े खूबसूरत सिंगो वाले हीरण एकदम पास आकर आशा से देखने लगे कि हम कुछ खाने के लिये लाये हैं. यदि पता होता तो अवश्‍य ले जाते. बहुत दु:ख हुआ उनकी ऐसी हालत देखकर. न उनके लिये वहॉं खाने का इंतजाम दिखा न पानी का. बेचारे बेजु़बान जानवर. इसीके सामने एक बड़े चबूतरे पर तीन मंदिर और एक विशाल नंदी रखा था. देखा, बड़ा खूबसूरत नंदी था 13वीं सदी का. लगा कि कोई शैवमत के राजा ने बनवाया होगा. इस बीच में रामचन्‍द्रन जी इसी चबूतरे की सीढियों पर बैठ गये थे. 74 बरस की उम्र में सुबह से दो बार फुट ओवर ब्रिज चढ़ना-उतरना. दो बार बीएसएनएल की दूसरी मंजिल पर जाना-आना. एक घण्‍टे से ज्‍यादा खड़े होकर लेक्‍चर देना. मुझे सीखा रहा था कि कमीटमेंट और सीन्‍सियारिटी के आगे शरीर भी कुछ नहीं कर सकता. भारी-भरकम शरीर और पैर में राड. कहीं भी कोई शिकन और थकन नहीं. पूरी ऊर्जा के साथ वे हमारे संग चल रहे थे. हमने कुछ तस्‍वीरें सेल में कैद की और इसके बाद चल पड़े बी एस एन एल कार्यालय जहॉं के परिसर के गेस्‍ट हाउस में आधा-घण्‍टे रुके और तैयार होकर ट्रेन के लिए चल पड़े. इस बीच में रास्‍ते में हमने एक-एक कप चाय पी. एक सरकारी जूनियर कालेज से छूटकर बच्‍चे बाहर आ रहे थे. उनके कपड़े, चाल-ढाल से गरीबी, पिछड़ापन झॉंक रहा था कि जिस जिले से कृष्‍णा नदी बहती है उसके पाटों पर बसा नगर गरीब और सूखा है. क्‍या यही तेलंगाना है, बरसों की राजनीतिक स्‍वार्थपरता का परिणाम है या सबकी अदूरदर्शिता का परिणाम. कॉलेज में पड़ते हुए हम एक-दूसरे को मूर्ख या जाहिल ठहराने के लिए कहा करते थे कि 'ये लाल बस से उतरा है इसे क्‍या पता या पालमूर से आया है'.
घर आकर जब नेट पर महबूबनगर के बारे में पड़ा तो पता चला कि इसीका एक नाम पालमूर भी है.
[formerly known as "Rukmammapeta" and "Palamooru". The name was changed to Mahabubnagar on 4th December 1890, in honour of Mir Mahbub Ali Khan Asaf Jah VI, the Nizam of Hyderabad (1869-1911 AD). It has been the headquarters of the district since 1883 AD.  The Mahabubnagar region was once known as Cholawadi or the land of the Cholas'.  It is said that the famous Golconda diamonds including famous "KOHINOOR" diamond came from Mahabubnagar district.] 


रास्‍ते में बताया गया कि यहीं से कुछ दूरी पर अलमपुर स्‍थान है जहॉं लगभग आठ-नौ सौ बरस पुराने चालुक्‍य/चोल वंश के समय बनाये गये ब्रह्मा जी के नौ मंदिर हैं.  प्राचीन, खूबसूरत और विशाल मंदिर.  कहा जाता है कि भारत में केवल दो जगह ब्रह्मा जी के मंदिर हैं एक पुष्‍कर में और दूसरा यहॉं.  अब इन्‍तज़ार है फिर से हैदराबाद से महबूबनगर और कर्नूल तक यात्रा कर भ्रमण करने का ताकि मैं और मेरे परिवार सहित सभी संगी-साथी सब देख-सुन सके. राजभाषा हमेशा सीखाती रही है और सीखाती रहेगी.