Thursday, January 26, 2012

हुरडा खाने का अद्भुत अनुभव



नये साल की बात है. हमारी ममेरी साली ने फोन कर शोलापुर आने का न्‍यौता दिया. पूछा तो बताया कि हुरडा खाने आइए. मेरी समझ में नहीं आया लेकिन जाने की हामी भर दी. वैसे बाहर जाने का फितुर चल ही रहा था उसमें यह न्यौता आ गया. फोन रखने के बाद श्रीमती जी से पूछा कि क्‍या कोई फंक्‍शन अटेण्‍ड करने जाना है. वह ठहाका लगाकर हँसने लगी. मैं मन ही मन सोचा यह क्‍या है जो मुझे मालुम नहीं और ये हँस रही हैं. खैर, हुरडा क्‍या होता है श्रीमती ने समझाया पर अपनी समझ में ज्‍यादा कुछ नहीं आया. लेकिन, इण्‍टरनेट पर बैठ रिजर्वेशन की उपलब्‍धता चेक कर  फौरन वेटिंग लिस्‍ट में 20 जनवरी जाने और 22 जनवरी लौटने का रिजर्वेशन करा लिया.

कामकाज की आपाधापी में भूल गया कि हुरडा क्‍या होता है पता करना है. ऊपर से वेटिंग लिस्ट रिजर्वेशन, तो थोड़ा उत्‍साह भी कम था. देखते-दिखाते 20 तारीख आ ही गयी. हमारे ममेरे साढ़ू  श्री अजीत ओक रेल्‍वे में काम करते हैं तो उनसे भी बात की. उन्‍होंने भी हुरडे की दावत पर बुलाया लेकिन ढाक के वही तीन पात ज्‍यादा समझ में नहीं आया. सोचा अब जाकर ही देखते हैं. इस बीच श्रीमती ने बताया कि अजीत जी बहुत ही परिश्रमी और नौकरी के साथ मन लगाकर बागवानी व खेती का काम करने वाले हैं. उनका घर हर मायने में हरा-भरा है. उनके बारे में सुनकर और उनसे  बात कर लगा कि मिलना चाहिए.

20 तारीख हुसेनसागर एक्‍सप्रेस से शोलापुर के लिए रवाना हुए और 9.30 बजे शोलापुर पहुँच गए. नामपल्‍ली रेल्‍वे स्‍टेशन कई साल के बाद गये थे सो देखकर हम सभी दुखी हुए कि साफ-सुथरा रखा जाने वाला यह स्‍टेशन बदहाल पड़ा है. बैठने की कुर्सियॉं नहीं. खाने-पीने के सामान की दुकाने नहीं. खाली पटरियों पर गंदगी फैली पड़ी है. स्‍टेशन बेघर, भिखारियों और जानवरों का आसरा दिखायी दे रहा था. लगा कि सरकार यदि 32 रु. कमाने वाले को गरीब नहीं मानती है तो ये सभी गरीब देश के अमीर वासी हैं और हक से इस जगह का इस्‍तेमाल कर रहे हैं.
रेल चली. बेटी के बहाने रेल में जो भी अटरम-सटरम आता गया, सब खाते गये. सामने बैठे मुंबई जाने वाले मारवाड़ी यात्री लोग अचरज भरी निगाहों से देख सोच रहे थे कि हमसे ज्‍यादा चिरडण्‍डी खाने वाले ये कौन लोग हैं. बड़े ग्रुप में किसी शादी से शायद लौट रहे थे. जबरदस्‍ती आजू-बाजू बैठ कान-फाड़ू आवाज में मारवाड़ी में अपने घर-नुक्‍कड़ों की बड़-बड़ बेलगाम किये जा रहे थे. इन 9 घण्‍टो के सफर में कई बार लगा कि मना करूँ लेकिन धैर्य रख चुप रह गया.

किसी तरह खाते-खिलाते शोलापुर पहुँच गये. ममेरी साढ़ू और साली लेने पहुँच गये थे. मन में पिछले महीने राष्‍ट्रपति के दौरे के दौरान अमरावती में गुजारे 13 दिनों की यादें ताजा थी. सो, उतरते ही चारों ओर महाराष्‍ट्र का वैसा ही खास कल्‍चर दिखायी दे रहा था. सब जगह मराठी में लिखे नेम बोर्ड और मराठी ही बोलते लोग. खूबसूरत अक्षरों में लिखी जानकारियां मेरे हिन्‍दी ज्ञान के कारण अटपटी लग रही थीं. अधिकतर ह्रस्‍व मात्राएं दीर्घ और दीर्घ की जगह ह्रस्‍व का प्रयोग. अल्‍पप्राण की जगह महाप्राण मैं उच्‍चारित करने में मन ही मन असहज महसूस कर रहा था. जैसे जेराक्‍स को झेराक्‍स, जिला को जिल्‍हा, टीवी को टीव्‍ही आदि. लोगों के सरनेम भी जबान पर नहीं चढ़ रहे थे. फुलझेले, तलपड़े, पुच्‍चापुरकर, चितळे, पेठकर, पाटकर, लेटकर, लाटकर, जावळेकर, हेड़गेवार आदि तो दूध को दुध पढ़ना-सुनना, जिलेबी को जिलबी कहना-सुनना, टिफीन को डब्‍बा बोलना, स्‍कूल को शाला, छुट्टी को सुट्टी कहना, कई नाम जैसे अपूर्व को अपूर्वा, आदित्‍य को आदित्‍या, सुगंध को सुगंधा बोलना, गंदा को घाण्‍ड आदि कहना, सुनने में अजीब और अटपटा सा लग रहा था. साथ ही, किसी के पति को अमचे / त्‍येंचे मिस्‍टर कहकर मिलाना बुरी तरह खटक रहा था जैसे अच्‍छे खाने में जले बघार की तरह. गनिमत लगा कि हमारे साढ़ू साहब का सरनेम ओक है.  लगा कि कोई जानकार (भाषाविज्ञ तटस्‍थ दृष्‍टि रखने वाला) इन बातों पर ध्‍यान क्‍यों नहीं देते. वैसे घर में सुधार अभियान कई बार चलाकर कोशिश की पर मराठी के अगाध प्रेम के कारण श्रीमती जी में ठाकरे बन्‍धु अभियान शुरू करते ही अवतरित हो जाते हैं फिर तेरी भी चुप और मेरी भी चुप.

प्रसंगवश विषयान्‍तर हो गया. इस बीच स्‍टेशन से जैसे ही घर पहुँचे, स्‍वागत के लिए दो शेरदार कुत्‍ते स्‍वागत के लिए पिंजरे से ताड़ रहे थे. बेटी और मैंने डरकर हाथ लगाया और कुछ ही मिनटों में वे सूँघने-चाटने लगे. एकदम तगड़े और बोलते चेहरे वाले जानवर. अजीत जी के तो सर तक उनके हाथ-मुँह जा रहे थे और वे उन्‍हें लाड़ करने पर बाध्‍य कर रहे थे. मैं तो रिश्‍तेदारों को छोड़ कुत्‍ते देखने में ही खो गया था. इनके नाम भी राजा-रानी. वैसे मैंने देखा है कि अधिकतर मराठी भाषी मॉं-बाप अपनी बेटियेां को राणी (रानी) कहकर ही बुलाते हैं. बेटियों के लिए राणी शब्‍द मराठी समाज का एक यूनिवर्सल संबोधन है. इससे अन्‍यों की बेटी को भी बिना नाम बुलाना आसान हो जाता है. सब एकसा क्‍यूं बुलाते हैं यह महाराष्‍ट्रीयन समाज में देखा-देखी से फैली भाषा-संस्‍कृति की एक मिसाल है. इस बीच फ्रेश हुए और सब खाने बैठ गए. बड़े-छोटे सब नीचे बैठकर ही खाए. नरम-मुलायम रोटी और दाल, आलू-शिमला मीर्च की सब्‍जी. काम बेझिझक निपट गया. वैसे पेट ठूँसकर भर चुका था. लेकिन रिश्‍तेदारी में खाना जरूरी था. फिर पहली बार हो तो और भी जरूरी.

खैर, लब्‍बो-लुआब ये रहा कि शुक्रवार खाने के साथ बातचीत और थकावट के बाद देरी से सोने में कट गया. सुबह उठे. तैयार हुए और श्रीमती जी ने बताया कि यहॉं से तुलजापुर नजदीक है और अजीत ने कहा कि 3-4 घण्‍टे में जाकर-आ सकते हैं तो हम निकल पड़े. पेट में उपमे का नाश्‍ता जा चुका था. साथ में बेटी के नाम पर डिब्‍बे में कुछ रख भी लिया गया था. मॉं तुलजाभवानी हमारी कुलदेवी है सो दर्शन करने ही थे. मन्‍दिर पहुँचकर बड़े आराम से घण्‍टे भर में दर्शन हो गए. लौटने से पहले मुख्‍य मन्‍दिर के गर्भगृह की दीवार के ठीक पीछे एक गोलनुमा पिण्‍डरूपी पत्‍थर रखा है जिस पर मान्‍यता अनुसार हाथ रखकर की गई मनोकामना जल्‍द पूरी होने वाली हो तो पत्‍थर दाहिनी तरफ घूमता है. पिछली बार यह देखना रह गया था सो इस बार याद से देखे. मेरे हाथ रखते ही पत्‍थर तेजी से दाहिनी ओर घूमा. जो कामना कर बाहर आया उसके जल्‍द पूरी होने की संभावना से मन पुलकित हो गया. फिर पत्‍नी और बेटी ने भी यही किया. वापस शोलापुर लौट आराम किए और शाम में वहॉं लगी नुमाईश देखने की फरमाईश पर हमारे साढ़ू वहॉं ले गए. लगभग हैदराबाद जैसी नुमाइश पर अव्‍यवस्‍थित ढंग से लगाई गई. खचाखच भरी हुई. चारों तरफ धूल-मिट्टी और तिल रखने तक की जगह नहीं. बामुश्‍किल वहॉं से निकले और जिस वजह से यह गड्डा(मेला) सालाना तौर पर लगता है वहॉं गए. यह मेला सिद्धेश्‍वर स्‍वामी की जयंती पर लगाया जाता है. सिद्धेश्‍वर संत शिवभक्‍त थे जिन्‍होंने 68 शिवलिंग की स्‍थापना यहॉं की है. मुख्‍य मन्‍दिर शिवजी का है और साथ में संत सिद्धेश्‍वर का समाधि स्‍थल. इस मन्‍दिर की खास बात है कि यह लगभग 32 एकड़ में तीन ओर से फैले सरोवर में स्‍थित है. यह सरोवर 2 मीटर से लेकर लगभग 11 मीटर तक गहरा है. छोटी-मोटी बोटिंग भी लगे हाथ कर डाली. हाथ से नाव खेवने वाले के भुजदण्‍ड और उसकी फूर्ती देखते ही बनती थी.  मन्‍दिर परिसर काफी बड़ा है जिसमें मुगलकालीन कन्‍दीलों पर लगने वाले कॉंच के बुग्‍गे (लैंप डोम्‍स) लटके हुए थे. बड़ा ही सुन्‍दर है और इसके साथ प्रवेश द्वार पर मस्‍जिद भी बनी है. कारण ऐतिहासिक हैं कि यहॉं औरंगजेब और आदिलशाह का शासन रहा. इसी कारण यहॉं मुस्‍लिम समाज का भी अच्‍छा-खासा प्रतिनिधित्‍व है कन्‍नड़ और मराठी समाज के साथ. आबादी लगभग दस लाख है और यह एक बी-क्‍लास शहर है. विकास की जबरदस्‍त संभावनाओं से लबरेज है बशर्ते राजनीतिकारों को अपने चश्‍मे और झोली में यह संभावना दिखाई दे. राजनीतिक दलों की आपसी तनातनी और रस्‍साकशी जगह-जगह प्रदर्शित विशालकाय होर्डिगों और बैनरों से देखी-समझी जा सकती है. बातों-बातों में पूछ डाला कि यहॉं कौनसी चीजे मशहूर हैं तो पता चला कि शोलापुरी चादरें और चुडवा. किसी तरह घूम-फिरकर रविवार हुरडे की दावत के इंतजाम के लिए पनीर खरीदते घर पहुँचे और फिर दुकान बंद होने की घड़ी में मशहूर दुकान क्षीरसागर चादरवाले के पास जा पहुँचे जो निर्माता - निर्यातक हैं अपने डबल एलिफेण्‍ट वाली चादरों व अन्‍य चीज़ों के. चादरें देखी. दिलकश और टची. दो-तीन खरीद डाली. घर आकर बताई जो सबको पसन्‍द आयीं. श्रीमती जी ने अगले दिन जाकर कुछ और खरीदने की फरमाइश की तो अगले दिन भी पहुँच गए और मन-मुताबिक मनभर चादरें खरीद डालीं.

अगले दिन रविवार टनाटन होकर तैयार हो गए. अल सुबह से ही अजीत की मॉं, सास, पत्‍नी और हमारी श्रीमती जी खेत पर ले जाने के लिए पालक-पनीर की सब्‍जी और अन्‍य खान-पान की चीज़ें बनाने में लग गए. तैयार होते-होते सुना कि अजीत जी, उनकी पत्‍नी और बेटी के कुछ मित्र मिलाकर 25-30 लोग खेत पर हुरडे की दावत पर आने वाले हैं.  दो-तीन वजनदार थैलियों में सब सामान डालकर निकल पड़े. शोलापुर से बीजापुर जाने के राजमार्ग पर लगभग18 किलोमीटर दूर हुत्‍तुर नामक गॉंव में अजीत की 10 एकड़ जमीन है जो अब तक के जीवन की कमाई हुई उनकी एकमात्र सम्‍पदा है. सब लोग बाहर आए और अजीत जी ने एक टमटम (सात सीटर आटो) बात किया और 6 बड़े और 5 बच्‍चों को बिठाकर रवाना कर दिया. हैदराबाद से होने के कारण एक दिन पहले से ही मन में बेचैनी और घबराहट चल रही थी कि सेवन सीटर में बैठकर जाना असुरक्षित होगा और मेन रोड के बाद 3-4 किलोमीटर बैलगाड़ी में. मैं कार करने पर जोर दे रहा था पर अजीत जी ने मना कर दिया तो मैं मन मारकर चुप रह गया. मैं तो मोटर साइकिल पर चला गया लेकिन सबके खेत तक सुरक्षित पहुँचने तक मेरी जान में जान नहीं थी.

खेत देखा तो तबियत हरी हो गई. लगभग 5 एकड़ में मौज के 5000 झाड़. बाकी में जवारी. गेहूँ, तुवरदाल, देढ़़ लाख रेशम के कीड़े और उनकी खादगी के लिए शहतूत के पेड़. 40 फीट लंबी,चौड़ी और गहरी बौड़ी तथा दो बोरवेल. बड़ी सधी हुई व्‍यवस्‍थित और बायो-एग्रीकल्‍चर खेती का नमूना देख दिल खुश हो गया. अपने बचपन के दिन याद आ गए जब पिताजी के साथ अपने खेत जाया करता था. कई बातें और यादें ऑंखों के सामने दृश्‍य बनकर छा रही थीं. अजीत जी में भी खेती की वैसी ही दिवानगी देखी जैसे पिताजी में थी. बन्‍दगी के हद की दिवानगी. तीन-चार अलग-अलग शिफ्टों में रेल्‍वे रिजर्वेशन काउण्‍टर या पूछताछ अथवा चार्टिंग की नौकरी करना और रोज समय-असमय खेत जाना और काम देखना. खेती की पढ़ाई करना. एक मिसाल सामने थी मेरी. कहा जाता है life is a great balancer.  फिर आज अपने सामने एक बड़ी लकीर अजीत ने खीच रखी थी. मेहनत, साहस और लगाव का बेमिसाल जस्‍बा. दिल से लाखों दुआएं उनके लिए निकलीं. रास्‍ते में और बात करते-करते पूछा तो पता चला कि घर पर वे 20-22 बरस नर्सरी चला चुके हैं. घर में 350 नमूने के गुलाबों का बगीचा था. 20-22 गाय-भैंस और रोज 250 लीटर के करीब दूध का कारोबार. यह सब देख-सुन अजीत के प्रति और भी आदर बढ़ गया था. बार-बार एक गीत याद आ रहा था 'हम मेहनतकश्‍त इस दुनिया से सब अपना हिस्‍सा मॉंगेंगे, एक बाग नहीं, एक खेत नहीं हम सारी दुनिया मॉंगेंगे'. अजीत का और कोई शौक नहीं. केवल अनुशासित ढंग से नौकरी करना और विभिन्‍न तरह की खेती के तरीकों के बारे में पढ़ना व खेती करना. उन्‍हें पहले से ही नौकरी का शौक नहीं रहा. राष्‍ट्रीय स्‍तर के हॉकी खिलाड़ी रहने, भारतीय टीम में चुने जाने की बदौलत रेल्‍वे में पिताजी के लोको इन्‍सपेक्‍टर रहते दो बार मौका भी आया पर मना कर दिया. लेकिन, भाग्‍य पिताजी के अकस्‍मात चले जाने के कारण वहीं ले आया और अब वे दोहरी जिम्‍मेदारी पूरे समर्पण से निबाह रहे हैं.

खैर, इस बीच पूरे खेत का जायजा ले लिया गया और वहॉं देखा कि सिगड़ी पर जवारी की गरम-गरम रोटियॉं बन रही हैं. एक छोटी लगभग दस सालाना बच्‍ची भी थाप-थापकर रोटी बना रही थी. सोंधी-सोंधी खुशबू से खाने का मन कर रहा था. घर पर तो पोहे भरपेट खाकर निकले थे. बड़े ही मुलायम और स्‍वादिष्‍ट पोहों का नाश्‍ता हुआ था इसलिए थोड़ा रुक गया. इस बीच दूसरे मेहमान भी आने लगे थे. हुरडे के लिए शिवा (खेत पर काम करने वाला) तैयारी करता दिखा. पेड़ों की छॉंव में एक गड्डा खोदा गया. कुछ उपलियॉं जलायी गयीं. एक टब में शिवा जाकर जवारी के एकदम कौंले भुट्टे लेकर आया. सभी महिलाएं, बच्‍चे और अजीत के दोस्‍त चंदू तपाड़िया और उनके साथी बैठ गए. सबके सामने पत्‍तलों में भूनकर नमक लगाई हुई फल्‍ली, लाल मिर्च मिलाकर बनायी गयी फल्‍ली की ही सूखी चटनी, गुड़ परोसा गया. साथ में हिदायत थी कि हुरडा खाकर पानी नहीं पीना है. छॉंछ पीना है. प्‍लास्‍टिक से बने गिलास रखे गये और उसमें बटलोई (छोटा घड़ा) से निकालकर छॉंछी भरी गयी.  अब शिवा बैठ चुका था. उपलियों की ऑंच बुझ चुकी थी. गरम-गरम उपलियों की राख के नीचे दबी-सुलगी आग में जवारी के कौंले भुट्टे रखे गये. अजीत भी शिवा के सामने बैठ गए. हर आधे मिनट में एक-एक भुट्टा डंडी के साथ सेंककर शिवा अजीत को देता गया और अजीत जी गरम-गरम भुट्टे को हाथों से मलकर उसके दाने निकालते गये. हमारी साली साहिबा सभी को बारी-बारी से सोंधी-सोंधी खुशबू में सने हरे-सुनहरे भुट्टे के दाने खाने के लिए परोसने लगी. मुझे जैसे ही मिले. एक मुट्ठी दाने मैंने मुँह में डालकर चबाये. चबाते ही मुँह से निकला वाह! क्‍या स्‍वाद है. सोंधे-सोंधे मीठे-मुलायम दाने ऐसा लगा मानो हरे-भरे मोतियों के दाने हों. क्‍या महक और क्‍या स्‍वाद. मैं अजीत जी को कहने से नहीं रोक पाया अद्भुत। एक दम दिव्‍य अनुभव. दुआ निकली कि आपका खेत यूँ ही सदा हरा-भरा रहे. उनके हाथ अब तक गरमा गरम भु्ट्टे मसलकर  काले-लाल हो चुके थे पर माथे पर शिकन की जगह चेहरे पर खातिरदारी और खिलाने का संतोष झलक रहा था. ऐसे भुट्टे के दाने मैंने कभी नहीं खाए. पेटभर छक कर हुरडा खाता गया. छॉंछ भी एकदम लजीज. पीसी हरी मीर्च,  गुड़ मिलाकर बनायी भुने जीरे के स्‍वाद से पटी मक्‍खनदार छॉंछ गटागट पेट में उतरती गयी. बीच-बीच में सबके साथ मैं भी साबित फल्‍ली और फल्‍ली की चटनी खा रहा था. खेत में बैठकर पेड़ों की छॉंव में यूँ इस तरह खाने का ये पहला मौका था. बच्‍चे फुल खुश थे. पेड-पौधों के बीच में छिपना-भागना चल रहा था. एक कुतिया, उसका उछल-कूद करता बच्‍चा और एक छोटी बिल्‍ली और दो बैल भी हम सबको देखकर लगा कि खुश हैं और सबके लाड़-प्यार की उम्‍मीद से पास-पास आ रहे थे.

इस बीच अजीत के एक और दोस्‍त डॉ मुकुंद रे परिवार के साथ आ गए. बैठे तो कुछ देर बाद परिचय हुआ. एम डी रूमेटोलॉजिस्‍ट हैं. शोलापुर, कोल्‍हापुर और पुने में प्रैक्‍टिस करते हैं. संयोग से उनकी पढ़ाई का कुछ हिस्‍सा निजाम इंस्‍टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइन्‍सेस में बीता था तो हैदराबाद और यहॉं की मशहूर डाक्‍टर बिरादरी से परिचित थे. कुछ पहचान के कॉमन डाक्‍टर भी आपस में निकल आए. हुरडा खाते-खाते एक बात उन्‍होंने बतायी कि हुरडे को उत्‍तर भारत में होरहा (याने जो अभी पूरा नहीं हुआ है तैयार हो रहा है) कहते हैं. जैसे ही उन्‍होंने ये बात कही मेरी इतने दिनों से चली आ रही बेचैनी शांत हो गइ्र और हुरडा किसे कहते हैं पता चल गया. वे पंजाब का भी हुरडा खा चुके थे. सो उन्‍हें पता था. अब हुरडे का स्‍वाद और भी बढ़ गया. गपशप बढ़ती चली गयी. अजीत जी ने एक दिन पहले ही अपने बारे में कहते हुए बताया कि वे इतने सरल रहने का राज उनक खिलाड़ी होना है क्‍योंकि खेल आदमी को हमेशा जमीन पर रहना सीखाता है. हवा में उड़ने वाले को कोई-न-कोई खिलाड़ी जमीन पर ला ही देता है. दूसरी बात डा मुकुंद ने हुरडा क्‍या होता है बताया तो ये बातें सीखकर मजा आ गया. लगे हाथ श्रीमती जी के साथ हो रही बातचीत सुनकर मुकुंद जी ने मेरे द्वारा भारतीय क्रिकेट और धोनी के हाल पर दिए गए कथन को कोट करते हुए कहा कि  'पीक पर रहकर विथड्रा करने आना चाहिए' ये बात आपने पते की कही है और जब हुरडे से पेट भर गया तो उन्‍होंने कहा मैं अब विथड्रा कर रहा हूँ वरना नुकसान हो जाएगा. गपशप चलती रही. उन्‍होंने बताया इतने बड़े देश में लगभग 500 रुमेटॉलॉजिस्‍ट ही हैं. सुनकर आश्‍चर्य हुआ. अजीत जी ने बताया कि डाक्‍टर रे के हाथ में तासीर है और अच्‍छा इलाज करते हैं. उन्‍हें देखकर भी लगने लगा था कि ब्राइट डाक्‍टर हैं. बाद में उनकी पत्‍नी ने देखा और इमली के झाड़ पर लगी इमलियों की ओर इशारा किया तो मुकुंद जी, उनके फिजियोथेरेपी पढ़ रहे लड़के और मेरा बचपना कुलाछें मारने लगा. हम तीनों इमली तोड़ने में लग गये. पानी के बहाव के लिए खुदी छोटी नहर के ऊपर नीम का पेड़, उस पर लटकती बड़ी-बड़ी इमलियॉं. एक-एक कर तोड़ने लगे. मुकुंद और उनका लड़का तो पेड़ पर चढ़ गये और मैं अपनी लंबाई के बल पर ही हाथ में आयी इमलियॉं तोड़ता रहा. देखा कि डाक्‍टर रे की फूर्ती गजब की है. बाद पता चला कि वे रोज 15 किलोमीटर साइकल चलाते हैं व योगासन और न जाने क्‍या-क्‍या करते हैं. बहरहाल बेटे से ज्‍यादा बाप को फिट देख अपने पर शरम छा गयी. हुरडा, फल्‍ली, इमली और चार बजते-बजते खाने की तैयारी हो गयी.  वैसे जगह तो नहीं थी पर खाना तय था. खाने बैठे. नरमानरम जवारी की रोटी, पालक-पनीर की सब्‍जी, फल्‍ली की चटनी, छॉंछ सट-सट कर अंदर चली गयीं. हुरडा खाकर मैंने अजीत जी को अद्भुत कहा तो पालक-पनीर की सब्‍जी खाकर लाजवाब. क्‍या स्‍वादिष्‍ट सब्‍जी. एकदम बैलेन्‍स. पनीर भी बादामी रंग में सेंक कर डाला गया. स्‍पांजी और खाने में खुस-खुसा. इसके बाद बगारे चॉंवल परोसे गये. शिवा की पत्‍नी ने शायद बनाये थे. लज्‍जददार खाना. मैंने डाक्‍टर साहब के साथ हाथ में कुछ खाने के पैकेट भी देखे थे. सो पूछ डाला. फिर कोल्‍हापुरी चुडवे का पैकेट भी खुल गया और इसके साथ खाने में और जान आ गयी. आखिर में छॉंछ पीकर फुलस्‍टाप लगा दिया. ये हाल हो गया कि उठ नहीं पा रहे थे. जी भर खाए. कुदरत की गोद में बैठने से खाने की कुव्‍वत दो गुना हो गयी थी. उठे और रीढ सीधी किए. अब न बोला जा रहा था न खड़ा. गो-शाला से सटे चबूतरे पे मैं और डाक्‍टर बैठ गए और ये देखना भी भूल गए कि वह गेरू से रंगा था. बाद में देखे कि गेरू दोनों की जीन्‍स पैंट के पीछे पुत चुका है. अपने पैंट झटकने में भी तकलीफ हो रही थी. इतनी देर में डाक्‍टर साहब के फोन का रिंग टोन सुना तो शोले की मशहूर माउथ आर्गन पर बनायी गयी धुन थी जो अमिताभ कई बार फिल्‍म में बजाते हैं. रहा नहीं गया तो ट्यून ट्रान्‍सफर करा लिया. इस बीच वे बोले माउथ आर्गन साथ नहीं है वरना लाइव ही रिकार्ड करा देता था. याने वे ये बजाना जानते हैं. और अगली बार के लिए इसे ड्यू रखा. डॉक्‍टर साहब बच्‍चे को पूना भेजने की जल्‍दी में थे सो चले गये और मैं वही बिछी हुई नेट पर लेट गया. अजीत भी बैठ गए और पूछकर चाय बनवायी. चाय पीये और 5.30 बजे के लगभग निकल पड़े क्‍योंकि आकर रात 10.30 की गाड़ी से रवाना होना था और उससे पहले जाकर चादरें खरीदना था. आटो वाला भी आ गया और सबको बिठाकर हम निकल पड़े.

रास्‍ते में एक और डाक्‍टर ने अपने खेत पर अजीत जी से खेती पर राय लेने उन्‍हें बुलाया था सो जाना पड़ा. वहॉं भी हुरडे की दावत चल रही थी और चंदू सेठ यहॉं भी मौजूद थे. माहेश्‍वरी मारवाड़ी होने के नाते खाने-पीने की तबीयत के थे. दोपहर में हमारे साथ तो शाम यहॉं जमे हुए थे. बड़े खुले दिल के समाज में उठने-बैठने वाले व्‍यक्‍ति. जोर-जबरदस्‍ती कर वहॉं के भी हुरडे का स्‍वाद करा दिया. लेकिन दिल को लगा कि अजीत जी के खेत के हुरडे की बात कुछ और थी. वहॉं से लगभग घण्‍टे भर बाद निकल कर घर आए और सब बड़ों ने कैसा लगा कहा तो एक ही बात कह सका. शब्‍दों में बयां करना मुश्‍किल है हैदराबाद जाकर लिखकर ही भेजूँगा. बातों - बातों में फिर खाने की बात कही तो तौबा-तौबा कर दिया. वरना स्‍टेशन नहीं दवाखाने जाना पड़ता. फौरन श्रीमती को लेकर हम सब चादरें खरीदने गए और एकदम थोक में चादरें खरीद डालीं. श्रीमती जी और दुकानदार दोनों की चॉंदी हो गयी और अपना क्रेडिट कार्ड तो नरम पड़ गया. लाए और घर में दिखाकर शोलापुर की एक और खास चीज गन्‍ने का रस पीने गए. घर के पास में दुकान थी. वाह!  क्‍या रस था. एक बड़ा गिलास शरबत एक साथ गटक गया. अदरक, नीबू और बिना पानी मिला मीठा शरबत पीकर तबियत बाग-बाग हो गई. आखिर में सबसे विदा लेकर स्‍टेशन चल पड़े. मना करने पर भी अजीत जी और उनकी पत्‍नी स्‍टेशन तक छोड़ने आए.  रात 10.30 की गाड़ी 11.15 को आयी और ठसाठस भरी ट्रेन में सफर कर सुबह यहॉं पहुँच गए लेकिन रास्‍ते भर ट्रेन में दो दिनों की रील घूमती रही. लगा कि शहरी जीवन और एक छोटी जगह के लोगों के जीवन में कितना अन्‍तर है. लगा ऐसे ही और इन्‍हीं लोगों की मदद से शायद हमें दैनिक जीवन की कई चीज़ें सुलभ हो पा रही हैं. हमारे आराम में इनका कष्‍ट कभी दिखायी नहीं देता. इन्‍हें देखकर एक बात और भी लगी कि केवल इंजीनियरिंग, डॉक्‍टरी या एम बी ए ही पढ़ना पहला और आखरी लक्ष्‍य नहीं हो सकता. ये नौजवानों को समझना चाहिए. कई और विकल्‍प हैं और बेहतर विकल्‍प हैं. ईश्‍वर करे इस तरह मेहनत करने वाले सदा सुखी और खुशहाल रहें.  सभी को हुरडा खाने का मौका मिले इसी कामना के साथ अद्भुत अनुभव बयां करना रोकता हूँ.
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होमनिधि शर्मा 

Sunday, January 1, 2012

नव वर्ष मंगलमय हो !


नव वर्ष मंगलमय हो..  

स्वागत सब मिलकर करें, नए साल का आज
हिम्मत साहस से बढें, सुलझ जाएं सब काज|

नया नया विश्वास हो, नया नया संवाद
नयी नयी हो भावना, नया नया आह्लाद|

घर घर में जलते रहें, नेह भाव के दीप
प्रेमभाव की मुक्तिका, निपजे मन के सीप|

सपनों को अपना करें, बोकर श्रम के बीज
श्रम सीकर को बांधकर, बने नया ताबीज|

नए साल की मंगलकामनाओं सहित,
होमनिधि शर्मा

साभार : गिरिजाशरण अग्रवाल जी द्वारा प्रेषित पंक्‍तियां

Wednesday, February 16, 2011

प्रधानमंत्री बेबाक ......... 'हम भी मुँह में ज़बान रखते हैं'

....... कार्यालय से लौटा तो आज प्रधानमंत्री जी द्वारा बुलायी गयी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं देख पाने की बेचैनी थी। सात बजे के एन डी टी वी के समाचार देखने का इंतेजार कर रहा था। और सात बजे। समाचार में पी एम के बारे में की गई रिपोर्टिंग से संतुष्टि नहीं हुई। लगा कि पूरी कॉन्फ्रेंस देखनी चाहिये। संयोग से डीडी न्यूज़ पर रिकॉर्डिंग आ रही थी सो देखी।
स्कूल के समय से अब तक देश के पीएम के कार्यकाल याद करने पर वाजपेयी जी और अब मनमोहन सिंह जी ही अपने किए गए काम के लिए याद आते हैं (और राष्‍ट्रपति के रूप में डॉ कलाम. कारण इन तीनों के कोई व्‍यक्‍तिगत स्‍वार्थ नहीं रहे और निजी स्‍वार्थों के लिए कभी इन्‍होंने अपने पदों का दुरपयोग नहीं किया. इन तीनों के समय देश की गरिमा और साख पूरे विश्‍व में बढ़ी और बनी. इनका योगदान सर्वस्‍व सराहा गया. पूरे विश्‍व में ये सम्‍माननीय आज भी बने हुए हैं)  इन्दिरा जी, राजीव गांधी, नरसिम्हा राव, चंद्रशेखर जी, वीपी सिंह, देव गौड़ा, आई के गुजराल सभी याद हैं पर पूरे कार्यकाल के कामकाज के आधार पर नहीं पर कुछ खास कामों के लिए। इसमे दूसरों कि अपनी-अपनी राय हो सकती है।
मनमोहन सिंह जी जबसे प्रधानमंत्री बने हैं तब से उनसे एक परफारमर की अपेक्षा बनी और उम्‍मीद जागी कि अब जरूर कुछ अच्‍छा होगा. उनका पहला कार्यकाल बहुत बेहतरीन रहा और गॉंधी परिवार के बाहर दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने वाले वे दूसरे व्‍यक्‍ति बने. दूसरे कार्यकाल से और भी उम्‍मीदे बँध गयीं.अंग्रेजी की कहावतानुसार 'स्‍पीच इस गुड बट साइलेंस इस गोल्‍डन' प्रिंसिपल पर चलते हुए वे कलम और शासन चलाते रहे. मीडिया, पार्टियॉं, विपक्ष  उन्‍हें कमजोर, कटपुतली, निष्‍क्रिय, लाचार प्रधानमंत्री कहते रहे. पर, वे पूरी शालीनता के साथ शॉंत-चित्‍त रखते हुए काम करते रहे. न्‍यूक्‍लियर समझौता, सर्वशिक्षा अधिकार, नरेगा, सेना का आधुनिकीकरण, पे रिविजन आदि... कई प्रमुख लिये गये निर्णयों पर अडिग रहते हुए देश के साफ छविदार नेता बनने में  वे कामयाब रहे.

दूसरी पारी के चलते हाल ही में सामने आये घोटालों, भ्रष्‍टाचार, तेलंगाना, आतंकवाद, नक्‍सलवाद, माओवाद, महँगाई, न्‍याय प्रणाली की टिप्‍पणियों, प्राकृतिक विपदाओं आदि से काफी समय से घिरे मनमोहन सिंह ने आज चुप्‍पी तोड़ ही दी. संसद का एक पूरा सत्र जे पी सी की मॉंग की बली चढ़ गया. देश और जनता का कुछ फायदे का काम नहीं हो पाया. मुझे भी लग रहा था कि वे आखिर बोल क्‍यों नहीं रहे. खैर,  वे आज बोले. सुनकर प्रसन्‍नता हुई. लगभग 16 इलेक्‍ट्रानिकी चैनल के संपादकों के साथ खुशनुमा माहोल में किये सवाल-जवाब सुनकर लगा कि 80 की उम्र के करीब पुहुँचकर वे और भी सशक्‍त और मजबूत हो गये हैं. उनसे 2 जी स्‍पेक्‍ट्रम, ईसरों के देवास और एन्‍थ्रेक्‍स का मामला, सी ए जी, महँगाई, प्रशासन में कामकाज के तरीकों की चूक, पीएमओ द्वारा सूचनाओं की जानकारी लीक किए जाने संबंधी, आंतरिक और बाहरी कलह, विपक्ष के हमलों और जेपीसी की मॉंग, इन सबकी नैतिक जिम्‍मेदारी, तेलंगाना, माओवाद, उल्‍फा, तमिलनाडु, केरल में होने वाले आगामी चुनावों, केन्‍द्रीय मंत्रियों के डिस्‍क्रिएशनरी पॉवर्स को समाप्‍त करने, आने वाले बजट, क्रिकेट वर्ल्‍ड कप सहित दुनिया में तेजी से बदल रहे राजनीतिक घटनाक्रम ट्यूनिशिया, मिस्र, यमन, ईरान आदि के भारत पर असर से जुड़े सवालों का उन्‍होंने बड़े ही बेबाकी और साफ मन से जवाब दिया.  मसलन कि इन पूरे मामलों की क्‍या आप नैतिक जिम्‍मेदारी लेते हैं. क्‍या आप से इन सब मामलों में कहीं न कहीं कोई चूक हुई, इन घटनाओं पर शर्मिंदगी महसूस होती है आदि...  इस पर उन्‍होंने बड़े साफ मन से कहा कि हॉं मुझसे चूक हुई होगी लेकिन इतनी नहीं जितनी कि आप लोग बता रहे हैं. नैतिक जिम्‍मेदारी लेने से भी इन्‍कार नहीं किया और कहा कि जो कुछ भी हुआ उसे नहीं होना चाहिए था लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि हर बार पद छोड दिया जाए और हर छ: माह में चुनाव कराये जाएं. मनमोहन जी के साथ बहुत ही तगड़े और अनुभवी नेता हैं. प्रणव मुखर्जी, ए के अंटनी, वि़ मोइली, चिदंबरम, कपिल सिब्‍बल, जयपाल रेड्डी, पुरंदेश्‍वरी, प्रफुल पटेल आदि जो महत्‍वपूर्ण पदों पर हैं. कुछ एस एम कृष्‍णा, विलासराव देशमुख और शरत पवार जैसे लोग भी हैं जिनकी जगह दूसरे नेता भी हो सकते हैं. यहीं आकर उन्‍होंने यू पी ए की मजबूरी का सहारा लिया. अर्थात इन्‍हें गठबन्‍धन की राजनीति के कारण सरकार में रखना मजबूरी है जिसे विपक्ष और अन्‍य इनकी लाचारी समझते हैं (भूलना नहीं चाहिए कि बी जे पी सरकार के एन डी ए के 27 घटक थे जिनमें से अधिकतर सरकार में शामिल थे.) पर इससे संबंधित एक खास बात उन्‍होंने कही कि सरकार में बहुत कुछ उनके मन-माफि़क नहीं है पर चलाना जरूरी है. आज तक किसी प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक तौर पर इतना खुलकर नहीं कहा जिससे पता चलता है कि वे चीज़ों से अन्‍जान नहीं है और समय आने पर जो भी होगा, दुरुस्‍त करने से चूकेंगे नहीं.
दुनिया के राजनीतिक परिदृश्‍य में, किसी भी देश में प्रजातांत्रिक ढंग से दोबारा चुनी गयी सरकार के मुखिया बनने पर राष्‍ट्रप्रमुखों को एक सी परिस्‍थितियों का सामना करना पड़ा है.  मनमोहन जी भी इससे जुदा नहीं हैं. प्रधानमंत्री को सवालों के जवाब देते हुए सुनते और यह सब लिखते हुए मुझे 'वक्‍त' फिल्‍म का एक डायलाग याद आ रहा है कि 'चुनॉय सेठ, जिनके घर शिशे के हुआ करते हैं वे दूसरों के घर पर पत्‍थर मारा नहीं करते'.....मनमोहन जी पर उम्र हावी नहीं है बल्‍िक उन्‍होंने एक पूछे गये प्रश्‍न के जवाब में मेच्‍यूर्ड दार्शनिक अंदाज में कहा कि 'एक सिविल सर्वेण्‍ट से वित्‍त मंत्री और अब प्रधानमंत्री बनने में बहुत अंतर है जहॉं बहुत कुछ आपके मन मुताबिक नहीं हो सकता है फिर भी सबको साथ लेकर सरकार और देश चलाना कर्तव्‍य है जिसका पालन करते हुए मैं रोज सीख रहा हूँ. ऐसा कहते समय कोई शर्मिंदगी नहीं दिखाई दी बल्‍कि विनम्रता, साफ़गोई और सख्‍ती में कोई कमी नहीं दिखाई दी. उनके इस कान्‍फ्रेंस के कई मतलब निकाले जा सकते हैं जैसे 'फेस वाश', छवि सुधार (फेस करेक्‍शन) आदि पर देश के सामने आकर जिम्‍मेदारीपूर्वक खुले बयान देना उनकी प्रतिबद्धता और साहस को दर्शाता है जिस पर हमें संदेह नहीं करना चाहिए. देश एक मजबूत और समझदार शासक के हाथ में है यह बात आज पुन: लगी.  

कहना और भी है. 
यह साक्षात्‍कार अवश्‍य देखें रिपिट टेलिकास्‍ट या नेट पर.  

होमनिधि शर्मा

Monday, February 14, 2011

ये तिरंगा उम्र भर कश्मीर पर लहराएगा .. http://zealzen.blogspot.com/2011/01/blog-post_25.html

दिव्‍या जी, नमस्‍कार. सबसे पहले तो मेरा ब्‍लाग देखने के लिए धन्‍यवाद. मैं बरसों सोचता रहा कि एक ऐसा माध्‍यम होना चाहिए जिसके द्वारा हम अपनी बात एक-दूसरे तक बिना किसी रुकावट के पहुँचा सकें. इंटरनेट के आ जाने से यह सिद्ध हो पाया. आप और हम एक-दूसरे से परिचित भले ही न हो, इंटरनेट और इस पर हिन्‍दी के सहारे हमारा लेखन हमें सबसे जोड़ता चला जा रहा है.
जहॉं तक कश्‍मीर का सवाल है. मेरे अपने अध्‍ययन और जानकारी से कह सकता हूँ कि हमने इस मुद्दे को ठीक से हल नहीं किया और न ही हमारी नीति ही इस पर स्‍पष्ट है. कल ही की बात है पी डी पी की महबूबा मुफ्ती ने अपने प्रेसेंटशेन में कश्‍मीर के कुछ भाग को चीन का हिस्‍सा घोषित किया है और इस पर सरकार खामोश है. 26 जनवरी के अवसर पर यासीन मलिक की तिरंगा न फहराने की खुली चुनौती और उस पर की गई कार्रवाई बताती है कि सरकार इस मुद्दे पर दो तरफा नीति अपनायी हुई है और ना ही पूरी ताकत लगा रही है. अब तक जितनी सरकारे आयीं, सबने मुस्‍लिम वोट की राजनीति के आगे देश को शर्मसार किया है. आतंकियों को पनाह देने वाले और खुद आतंकी हम आम जन से ज्‍यादा सुरक्षित और मजे में है. सवाल देश-भक्‍ति का नहीं राजनीतिक स्‍वार्थ का है. प्रजातंत्र का सबसे बड़ा डिमेरीट यही है कि यदि इसके प्रतिनिधि इसका इस्‍तेमाल स्‍वार्थपरक उद्येश्‍यों के लिए करते हैं  तो यह सुसाइडल साबित होता है. ईश्‍वर इनको सद्बबुद्धि दे कि ये कश्‍मीर को मिस्र से जोड़कर देख रहें हैं और सरकार काला चश्‍मा पहने बैठी है. भारत के विदेश मंत्री यू एन ओ में पुर्तगाली मंत्री का भाषण पढ़ते हैं और इस भूल पर खेद तक व्‍यक्‍त नहीं करते अपितु इसे ग्‍लोरिफाई कर कहते हैं कि 'दूसरों का भाषण पढ़ना कोई गलत बात नहीं है. मैं क्‍या कर सकता हूँ मेरे सामने ढेरों कागजात थे अत: ऐसा हो गया.' अब ऐसे विदेश मंत्री का कहना हो तो एक दिन कश्‍मीर देकर कहेंगे ये तो देना ही था...... 
कश्‍मीर पर क्रमागत ऐतिहासिक जानकारी देकर जागरुक करने के लिए धन्‍यवाद और आपके रेल में दिखाये गये साहस पर बधाई. प्रेरणापद संस्‍मरण.

होमनिधि शर्मा

Tuesday, February 8, 2011

राष्ट्रीय ध्वज की अवधारणा

........हर साल की तरह इस बार भी मुझे कार्यालय में 26 जनवरी, गणतन्त्र दिवस के अवसर पर कार्यक्रम संचालित करना था। इस अवसर पर हमारी गणतांत्रिक व्‍यवस्‍था, संविधान, शासन प्रणाली, इतिहास, जीवन-दर्शन को वर्तमान हालात से जोड़ते हुए, किसी न किसी राष्‍ट्रीय महत्‍व के मुद्दों पर कार्यक्रम के संचालन के दौरान कुछ कहना एक परंपरा सी बन गई है.  इस परंपरा से जुड़ने का अवसर मुझे मारवाड़ी हिन्‍दी विद्यालय, बेगम बाजार, हैदराबाद में पढ़ते हुए प्राप्‍त हुआ.  विद्यालय भले ही हिन्‍दी माध्‍यम का रहा हो पर प्रधानाध्‍यापक डॉ युगलकिशोर शर्मा (संस्‍कृत और हिन्‍दी भाषा के विद्वान),  डॉ  बालागुरु जी (सामाजिक अध्‍ययन के जानकार और पुस्‍तकों के लेखक),          श्री ईश्‍वरअय्या जी (पारम्‍परिक और आधुनिक गणित और अंग्रेजी के रोचक गुरु), श्री रघुनाथ राव जी (जीव-विज्ञान विशेषज्ञ) डॉ रामकृष्‍ण दाण्‍डिमे (भौतिक-रसायन विशेषज्ञ) डॉ नारायण रेड्डी और श्री सुब्‍बाराव जी (तेलुगु) व अन्‍य गुरुजनों ने देश-भक्‍ति की भावना कूट-कूट कर भरी.  जीवन मूल्‍य और संस्‍कार देकर हमें ज्ञान के साथ संस्‍कारित किया. मैं और मेरे साथी छात्र दोस्‍त आज भी फक्र महसूस करते हैं कि हम एक मामूली विद्यालय में इतने बढि़या विद्वान अध्‍यापकों से पढ़े. आज  सोचकर सुखद आश्‍चर्य होता है कि उस समय के अध्‍यापक डॉक्‍टरेट जिनसे हम पढ़े. मेरे हिन्‍दी और राजभाषा के क्षेत्र में होने का भी एक बड़ा कारण मेरी स्‍कूली शिक्षा है. 
     खैर इसी प्रकार की दिलो-दिमाग की स्‍थिति होती है हर साल सो इस बार भी एक-दो दिन पहले से मन में चल रहा था कि किस खास बात पर इस बार बात की जाए. मन में आया कि हमारे ध्वज की अवधारणा के बारे में कार्यक्रम के दौरान कुछ जानकारी दूँ . इस संबंध में कुछ जानकारी थी तो कुछ जमा की। बाद में लगा कि इसे संकलित कर एक रूप दे दिया जाए तो सभी के काम आएगी. सो प्रस्‍तुत है.....

भारतीय तिरंगे का इतिहास


"सभी राष्‍ट्रों के लिए एक ध्‍वज होना अनिवार्य है। लाखों लोगों ने इस पर अपनी जान न्‍यौछावर की है। यह एक प्रकार की पूजा है, जिसे नष्‍ट करना पाप होगा। ध्‍वज एक आदर्श का प्रतिनिधित्‍व करता है। यूनियन जैक अंग्रेजों के मन में भावनाएं जगाता है जिसकी शक्ति को मापना कठिन है। अमेरिकी नागरिकों के लिए ध्‍वज पर बने सितारे और पट्टियों का अर्थ उनकी दुनिया है। इस्‍लाम धर्म में सितारे और अर्ध चन्‍द्र का होना सर्वोत्तम वीरता का आहवान है।"

"हमारे लिए यह अनिवार्य होगा कि हम भारतीय मुस्लिम, ईसाई, ज्‍यूइश, पारसी और अन्‍य सभी, जिनके लिए भारत एक घर है, एक ही ध्‍वज को मान्‍यता दें और इसके लिए मर मिटें।"

- महात्‍मा गांधी
     प्रत्‍येक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र का अपना एक ध्‍वज होता है। यह एक स्‍वतंत्र देश होने का संकेत है। भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज की अभिकल्‍पना आन्‍ध्र-प्रदेश के पिंगली वेंकय्या ने की थी. इसे इसके वर्तमान स्‍वरूप में 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था जो अंग्रेजों से स्‍वतंत्रता मिलने से कुछ ही दिन पूर्व की गई थी। इस ध्‍वज को पहली बार फहराने महिला स्‍वातंत्र्य वीर श्रीमती हंसा मेहता ने श्री नेहरू को सौंपते हुए कहा था कि यह ध्‍वज इस देश की समस्‍त महिलाओं की ओर से राष्‍ट्र को एक भेंट और सलाम है जिसकी लाज आप सबको बचाए रखना है. 
    इसे 15 अगस्‍त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बीच भारत के राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया गया और इसके पश्‍चात भारतीय गणतंत्र ने इसे अपनाया। भारत में ‘’तिरंगे’’ का अर्थ भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज है।
    भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज में तीन रंग की क्षैतिज पट्टियां हैं, सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफेद ओर नीचे गहरे हरे रंग की प‍ट्टी और ये तीनों समानुपात में हैं। ध्‍वज की चौड़ाई का अनुपात इसकी लंबाई के साथ 2 और 3 का है। सफेद पट्टी के मध्‍य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है। यह चक्र अशोक की राजधानी के सारनाथ के शेर के स्‍तंभ पर बना हुआ है। यह धर्म चक्र निरन्‍तरता का प्रतीक है. इसका व्‍यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है और इसमें 24 तीलियां है।

तिरंगे का विकास

यह जानना अत्‍यंत रोचक है कि हमारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज अपने आरंभ से किन-किन परिवर्तनों से गुजरा। इसे हमारे स्‍वतंत्रता के राष्‍ट्रीय संग्राम के दौरान खोजा गया या मान्‍यता दी गई। भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज का विकास आज के इस रूप में पहुंचने के लिए अनेक दौर से गुजरा। एक रूप से यह राष्‍ट्र में राजनैतिक विकास को दर्शाता है। हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के विकास में कुछ ऐतिहासिक पड़ाव इस प्रकार हैं:
1906 में भारत का गैर आधिकारिक ध्‍वज
1907 में भीका‍जीकामा द्वारा फहराया गया बर्लिन समिति का ध्‍वज
इस ध्‍वज को 1917 में गघरेलू शासन आंदोलन के दौरान अपनाया गया
इस ध्‍वज को 1921 में गैर अधिकारिक रूप से अपनाया गया
इस ध्‍वज को 1931 में अपनाया गया। यह ध्‍वज भारतीय राष्‍ट्रीय सेना का संग्राम चिन्‍ह भी था।
भारत का वर्तमान तिरंगा ध्‍वज
प्रथम राष्‍ट्रीय ध्‍वज 7 अगस्‍त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता में फहराया गया था जिसे अब कोलकाता कहते हैं। इस ध्‍वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था।
द्वितीय ध्‍वज को पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था (कुछ के अनुसार 1905 में)। यह भी पहले ध्‍वज के समान था सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपरी की पट्टी पर केवल एक कमल था किंतु सात तारे सप्‍तऋषि को दर्शाते हैं। यह ध्‍वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्‍मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।
तृतीय ध्‍वज 1917 में आया जब हमारे राजनैतिक संघर्ष ने एक निश्चित मोड लिया। डॉ. एनी बीसेंट और लोकमान्‍य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान इसे फहराया। इस ध्‍वज में 5 लाल और 4 हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्‍तऋषि के अभिविन्‍यास में इस पर बने सात सितारे थे। बांयी और ऊपरी किनारे पर (खंभे की ओर) यूनियन जैक था। एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान जो 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में किया गया यहां आंध्र प्रदेश के एक युवक ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया। यह दो रंगों का बना था। लाल और हरा रंग जो दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्‍दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्‍व करता है। गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्‍व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्‍ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए।
वर्ष 1931 ध्‍वज के इतिहास में एक यादगार वर्ष है। तिरंगे ध्‍वज को हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्‍ताव पारित किया गया । यह ध्‍वज जो वर्तमान स्‍वरूप का पूर्वज है, केसरिया, सफेद और मध्‍य में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था। तथापि यह स्‍पष्‍ट रूप से बताया गया इसका कोई साम्‍प्रदायिक महत्‍व नहीं था और इसकी व्‍याख्‍या इस प्रकार की जानी थी।
22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसे मुक्‍त भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया। स्‍वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग और उनका महत्‍व बना रहा। केवल ध्‍वज में चलते हुए चरखे के स्‍थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को दिखाया गया। इस प्रकार कांग्रेस पार्टी का तिरंगा ध्‍वज अंतत: स्‍वतंत्र भारत का तिरंगा ध्‍वज बना।

ध्‍वज के रंग

भारत के राष्‍ट्रीय ध्‍वज की ऊपरी पट्टी में केसरिया रंग है जो देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है। बीच में स्थित सफेद पट्टी धर्म चक्र के साथ शांति और सत्‍य का प्रतीक है। निचली हरी पट्टी उर्वरता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाती है।

चक्र

इस धर्म चक्र को विधि का चक्र कहते हैं जो तीसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ मंदिर से लिया गया है। इस चक्र को प्रदर्शित करने का आशय यह है कि जीवन गति‍शील है और रुकने का अर्थ मृत्‍यु है।

ध्‍वज संहिता

     26 जनवरी 2002 को भारतीय ध्‍वज संहिता में संशोधन किया गया और स्‍वतंत्रता के कई वर्ष बाद भारत के नागरिकों को अपने घरों, कार्यालयों और फैक्‍ट‍री में न केवल राष्‍ट्रीय दिवसों पर, बल्कि किसी भी दिन बिना किसी रुकावट के फहराने की अनुमति मिल गई। अब भारतीय नागरिक राष्‍ट्रीय झंडे को शान से कहीं भी और किसी भी समय फहरा सकते है। बशर्ते कि वे ध्‍वज की संहिता का कठोरता पूर्वक पालन करें और तिरंगे की शान में कोई कमी न आने दें। 
     सुविधा की दृष्टि से भारतीय ध्‍वज संहिता, 2002 को तीन भागों में बांटा गया है। संहिता के पहले भाग में राष्‍ट्रीय ध्‍वज का सामान्‍य विवरण है। संहिता के दूसरे भाग में जनता, निजी संगठनों, शैक्षिक संस्‍थानों आदि के सदस्‍यों द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रदर्शन के विषय में बताया गया है। संहिता का तीसरा भाग केन्‍द्रीय और राज्‍य सरकारों तथा उनके संगठनों और अभिकरणों द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रदर्शन के विषय में जानकारी देता है।
     26 जनवरी 2002 विधान पर आधारित कुछ नियम और विनियमन हैं कि ध्‍वज को किस प्रकार फहराया जाए:

क्‍या करें

  • राष्‍ट्रीय ध्‍वज को शैक्षिक संस्‍थानों (विद्यालयों, महाविद्यालयों, खेल परिसरों, स्‍काउट शिविरों आदि) में ध्‍वज को सम्‍मान देने की प्रेरणा देने के लिए फहराया जा सकता है। विद्यालयों में ध्‍वज आरोहण में निष्‍ठा की एक शपथ शामिल की गई है।
  • किसी सार्वजनिक, निजी संगठन या एक शैक्षिक संस्‍थान के सदस्‍य द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज का आरोहण/प्रदर्शन सभी दिनों और अवसरों, आयोजनों पर अन्‍यथा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के मान सम्‍मान और प्रतिष्‍ठा के अनुरूप अवसरों पर किया जा सकता है।
  • नई संहिता की धारा 2 में सभी निजी नागरिकों के लिए अपने परिसरों में ध्‍वज फहराने का अधिकार देना स्‍वीकार किया गया है।

क्‍या न करें

  • इस ध्‍वज को सांप्रदायिक लाभ, पर्दे या वस्‍त्रों के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है। जहां तक संभव हो इसे मौसम से प्रभावित हुए बिना सूर्योदय से सूर्यास्‍त तक फहराया जाना चाहिए।
  • इस ध्‍वज को आशय पूर्वक भूमि, फर्श या पानी से स्‍पर्श नहीं कराया जाना चाहिए। इसे वाहनों के हुड, ऊपर और बगल या पीछे, रेलों, नावों या वायुयान पर लपेटा नहीं जा सकता।
  • किसी अन्‍य ध्‍वज या ध्‍वज पट्ट को हमारे ध्‍वज से ऊंचे स्‍थान पर लगाया नहीं जा सकता है। तिरंगे ध्‍वज को वंदनवार, ध्‍वज पट्ट या गुलाब के समान संरचना बनाकर उपयोग नहीं किया जा सकता।
होमनिधि शर्मा 
     

    आचार्य जानकीवल्‍लभ शास्‍त्री :: एक साक्षात्‍कार http://manojiofs.blogspot.com पर अवश्‍य पढ़ें (5) पांचवां भाग :: उद्दाम जिजीविषा, (4) चौथा भाग :: निराला निकेतन : निराला जीवन : निराला परिचय (3) तीसरा भाग :: निराला निकेतन और निराला ही जीवन (2) दूसरा भाग : कुत्तों के साथ रहते हैं जानकीवल्लभ शास्त्री! (1) पहला भाग-अच्छे लोग बीमार ही रहते हैं!

    मनोज कुमार जी,  पहले तो क्षमा चाहूँगा कि पिछले एक वर्ष से आपके ब्‍लाग से गायब हूँ. पढ़ना जारी है परन्‍तु संपर्क न हो पाया.
    कुछ कार्य जीवन में ऐसे होते हैं जिससे करने वाले धन्‍य और कृतार्थ महसूस करते हैं. शास्‍त्री जैसे उद्भट शख्‍सियत से मिलकर और उन्‍हें हम सबसे मिलाकर आप कृतार्थ हो गये हैं. आपके समस्‍त परिजन और करण जी बधाई के हक़दार हैं. मैं व्‍यक्‍तिगत रूप से आपका आभार व्‍यक्‍त करता हूँ कि आपका यह साहित्‍येतिहासिक कार्य आने वाले समय में अपनी महती भूमिका निभायेगा.
    कुछ लोग अपने जीवन, विचार और व्‍यवहार से ऋषित्‍व को उपलब्‍ध होते हैं. विश्‍वास जानिये, शास्‍त्री जी को पढ़कर ऐसा ही लगा जैसे मैं विनाबा भावे और गॉंधी जी को देख रहा हूँ. वैसे बिहार की मिट्टी ही कुछ ऐसी है कि एक से एक सामाजिक, साहित्‍यक, राजनैतिक और ऐतिहासिक महापुरूष जन्‍म लेते रहे हैं. बाबू राजेन्‍द्र प्रसाद हों या ला़.ब.शास्‍त्री या जानकीवल्‍लभ शास्‍त्री जी, ऐसा लगता है 700 बी सी में नालन्‍दा में बने दुनिया के पहले विश्‍वविद्यालय की विरासत को क़ायम रखने ये युगपुरूष होते आ रहे हैं. 
    ये भी उतना ही सच है कि धिक्‍कार है इस व्‍यवस्‍था और इसके शासकों पर कि वे अपने युगपुरषों का ध्‍यान रखना और सम्‍मान करना नहीं जानती. दुनिया के शासकों ने सुकरात के पहले से अब तक सबके साथ यही व्‍यवहार किया है. जो शासक की गाते हैं वे इनाम पाते हैं. पद्मश्री ठुकराना दर्शाता है कि शास्‍त्री जी जीवन मूल्‍यों और नैतिकता की कितनी कद्र करते हैं. मुझे इन क्षणों में वाजपेयी जी कि वह पंक्‍तियॉं याद आ रही हैं 'हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा, काल के कपाल पर लिखता हूँ, मिटाता हूँ, गीत नया गाता हूँ......'
    यदि उनके रचना संसार से भी अंश ब्‍लाग पर पढ़ने को मिलें तो श्रेयस्‍कर होगा. 
    पुन: कोटि-कोटि बधाई़्

    होमनिधि शर्मा

    Tuesday, February 1, 2011

    नव वर्ष की शुरूआत मैं सृजन की टेक धारे हूँ ............... से

    प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा से बात करने और उनकी कविता या रचनाएँ पढ़ने में कोई अंतर नहीं है। जब भी उनसे बात होती है, वे नपे-तुले अंदाज़ और सीधे तरीके से अपनी बात रखते हैं चाहे विषय कोई भी हो। लेखनी में तो सपाट बयानी और तेवर देखते ही बनते हैं। उनकी तेवरियाँ पढ़कर तो उन्हे "आज के क्रांतिवीर" कहें तो गलत नहीं लगेगा। गद्य हो या पद्य उनके विचार और भाषा का संयोजन जैसे पाठक के लिए तस्वीर बन कर दिखाई देते हैं। अधिकतर लेखक और रचनाकार भाषा में उलझकर रह जाते हैं। लेकिन ऋषभदेव जी के साथ ऐसा नहीं है। उनका व्यक्तित्व, विचार और भाषा एक साथ चलते हैं। हाल ही में भेजी हुई उनकी यह रचना अपने ब्लॉग पर रखते हुए मुझे खुशी हो रही है : 



    सोमवार, ३१ जनवरी २०११


    मैं सृजन की टेक धारे हूँ

    तुम सदा आक्रोश में भरकर
                   मिटाने पर उतारू हो;
    मैं सृजन की टेक धारे हूँ.


    पत्थरों में गुल खिलाए
    पानियों में बिजलियाँ ढूँढीं,
    रेत से मीनार चिन दी
    बादलों को चूमने को,
    सिंधु को मैंने मथा है
    और अमृत भी निकाला.
    तुम सदा से बेल विष की ही
                   उगाने पर उतारू हो,
    मैं सृजन की टेक धारे हूँ.


    o
    मैं धरा को बाहुओं पर तोलता हूँ,
    हर हवा में स्नेह-सौरभ घोलता हूँ;
    मैं पसीना नित्य बोता हूँ,
    स्वर्ण बन कर प्रकट होता हूँ;
    आग के पर्वत बनाए पालतू मैंने,
    हिमशिखर पर घर बना निश्चिंत सोता हूँ.


    और तुम चुपचाप आकर
    भूमि को थर-थर कँपाते,
    भूधरों को ही नहीं,
    नक्षत्र-मंडल को हिलाते.
    तुम विनाशी शक्तियों के पुंज हो;
    तुम कभी दावाग्नि, बड़वानल कभी;
    तुम महामारी, महासंग्राम तुम.
    तुम सदा से मृत्यु का जादू
                    जगाने पर उतारू हो,
    मैं सृजन की टेक धारे हूँ.


    o
    लोग रोते हैं बिलख कर
                      तो तुम्हें संतोष मिलता.
    डूबती जब नाव, मरते लाख मछुआरे,
                           तुम्हें संतोष मिलता.
    आदमी जब ज़िंदगी की भीख माँगे,
    हादसा जब आदमी को कील टाँगे;
    हर दिशा में रुदन-क्रंदन,
    आदमी की शक्तियों का
                            शक्ति भर मंथन,
                     तब तुम्हें संतोष मिलता.


    बालकों के आँसुओं पर मुस्कराते हो,
    औरतों की मूर्च्छना पर राग गाते हो;
    झोंपड़ी की डूब पर आलाप भरते हो,
    लाख लाशों को गिरा शृंगार करते हो;
    सोचते हो आज तुम जीते-
                          हराया आदमी को,
    सोचते हो आज तम जीता -
                          हराया रोशनी को.


    पर नहीं! तुम जानते हो -
    मैं सदा ही राख में से जन्म लेता हूँ,
    ध्वंस के सिर पर उगाता हूँ नई कलियाँ;
    दर्द हैं, संवेदना, अनुभूतियाँ हैं पास मेरे,
    चीर कर अंधड़, बनाता हूँ नई गलियाँ.


    ओ प्रलय सागर!
    तुम्हारी रूद्र लहरों को प्रणाम!
    काल-जिह्वा-सी
    'सुनामी' क्रुद्ध लहरों को प्रणाम!
    तुम कभी नव वर्ष में भूकंप लाते हो,
    तो कभी वर्षांत में तांडव मचाते हो!
    तुम महा विस्तीर्ण, अपरंपार हो, निस्सीम हो!
    जानता हूँ मैं कि छोटा हूँ बहुत ही तुच्छ हूँ,


    पर तुम्हारे सामने
    मैं सिर उठाए फिर खड़ा हूँ;
    हूँ बहुत छोटा भले
    पर मौत से थोड़ा बड़ा हूँ.
    तुम सदा रथचक्र को उलटा
                    चलाने पर उतारू हो,  मैं सृजन की टेक धारे हूँ.




    कार्यालय आकर जैसे ही मेल देखा, आपका लिंक मिला. वास्‍तव में आप सृजन के टेकधारी हैं. कविता पढ़ते-पढ़ते दुष्‍यंत कुमार की बापू पर लिखी रचना 'मैं फिर जनम लूँगा.....' और बच्‍चन तथा निराला की बीच-बीच में से कुछ पंक्‍तियॉं याद आती रहीं. गांधीजी की पुण्य तिथि पर यह रचना पढ्ना मेरे लिए उन्हे याद करते हुए अपने आप को आईने में देखने का एक मौका साबित हुआ।  एक मुक्कमिल रचना जिसमें सृष्‍टि के क्रम से जुड़ा सब कुछ है. एक ब्रम्‍हा तो एक शिव, एक सलिला तो एक ज्‍वालामुखी, एक पावक तो एक पर्वत और इन सबके अलावा हमेशा की तरह एक 'तू' तो और 'मैं' है या वाजपेयी जी की ज़ुबान में कहूँ तो 'हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा, काल के कपाल पर, लिखता हूँ, मिटाता हूँ, गीत नया गाता हूँ..........' जब कविता पढ़कर लिखने का मन करे तो सच्‍ची और सबकी कविता होती है.
    बार-बार पढ़ने और हमेशा याद रखने लायक सर्जन के लिए पुन: आभार, 

    घर आकार फिर पढ़ा और अपनी भावनाओं सहित इसे पोस्ट कर रहा हूँ। 
    http://rishabhakeekavitaen.blogspot.com/2011/01/blog-post_31.html
    होमनिधि शर्मा
    ३१ जनवरी २०११ ९:४७ पूर्वाह्न